Tuesday, 13 August 2013

डेढ़ गुनी ज्यादा सैलरी पर राहुल के ‘वॉर रूम’ से जुड़ रहे हैं पत्रकार


त्रिदीब रमण

सीनियर पत्रकारों में राहुल गांधी के ‘वॉर रूम’ ज्वाइन करने की होड़ मची है। हालिया दिनों में कम से कम डेढ़ दर्जन पत्रकार जिनमें से अधिकांश भाजपा बीट कवर कर रहे थे, उन्होंने अपनी जमी-जमायी अखबार की नौकरी को लात मार कर कोई डेढ़ गुनी बढ़ी हुई तनख्खाह पर राहुल का साथ ज्वाइन कर लिया है। राहुल और उनकी टीम ने भाजपा बीट कवर रहे पत्रकारों को महज इसीलिए प्रमुखता दी है कि इनका मानना है कि ये पत्रकार भाजपा व संघ की अंदरूनी राजनीति और उनकी चुनावी रणनीतियों को बखूबी समझते हैं। राहुल ने इन पत्रकारों से वादा किया है कि लोकसभा चुनाव के बाद इन्हें उनके मूल संस्थानों में फिर से नौकरी दिलवा दी जाएगी। ‘वॉर रूम’ की नौकरी को ये पत्रकार भी खूब इंज्वाय कर रहे हैं, क्योंकि यहां काम का कोई तनाव नहीं है। ‘वॉर रूम’ में कोक, काफी की वेंडिंग मशीनों से लेकर किस्म-किस्म के सेंडविच की व्यवस्था है। जब यह पत्रकार फुर्सत में होते हैं तो राहुल की यार्कशायर टेरियर ब्रीड की मादा कुत्ता पिद्दी के संग खेल लिया करते हैं।    

सुचारू रूप से चल सकती है संसद

सोमवार से शुरू होने वाले संसद का मानसून सत्र के सुचारू रूप से चलने की संभावना है। कांग्रेस की डेमेज कंट्रोल टीम ने सर्वदलीय बैठक के बाद प्रमुख विपक्षी दलों के नेताओं से मिलने-जुलने का क्रम जारी रखा हुआ है। कांग्रेस रणनीतिकारों ने भाजपा और सपा दोनों दलों के समन्वय के लिए ज्यादा कोशिशें की हैं। सपा नेताओं की चिंता डिफेंस और टेलिकॉम सेक्टर में एफडीआई को लेकर है। वहीं सपा फूड सिक्यूरिटी बिल में एक तरह की पारदर्शिता चाहती है और सरकार से जानना चाहती है कि वे इस योजना को जन वितरण प्रणाली के साथ कैसे जोड़ेगी। वहीं भाजपा मोटे तौर पर फूड सिक्यूरिटी बिल और जमीन अधिग्रहण बिल को संसद में पास कराने के लिए तैयार हो गई है।

एक नए अवतार में अमर

अमर सिंह अपने एक नए सियासी अवतार में सामने आने को तैयार हैं। हालिया दिनों में सोनिया और राहुल से इनकी नज़दीकियां काफी बढ़ी हैं। इन्हें गांधी परिवार से नज़दीक लाने में दिग्गी राजा की एक महती भूमिका रही है। लिहाज़ा आने वाले लोकसभा चुनाव में पोस्ट पोल अलायंस को लेकर क्षेत्रीय दलों के साथ अमर की एक सक्रिय भूमिका हो सकती है। अमर की ममता बनर्जी, जयललिता, करूणानिधि और नवीन पटनायक जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों से काफी दोस्ती है। सो, वे चुनाव पश्चात इन क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस के पाले में भी ला सकते हैं। पूर्व में जब अमर दुबई के एक निजी अस्पताल में अपना इलाज करा स्वदेश लौटने वाले थे तो उनके पुराने मित्र अनिल अंबानी ने अपना एक विशेष चार्टर्ड विमान उन्हें दिल्ली लाने के लिए दुबई भेजा था, पर अमर अंबानी के विशेष विमान की बजाए अपने एक शेख मित्र के चार्टर्ड विमान पर सवार होकर स्वदेश लौटे थे। जब वे दुबई में थे तो सोनिया गांधी ने भी बकायदा उन्हें फोन कर उनका कुशलक्षेम पूछा था। 

पलटवार को तैयार मोदी
पार्टी के अंदर और बाहर अपने धुर विरोधियों से निपटने के लिए नरेंद्र मोदी की रणनीति तैयार है। सो, किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए जब आने वाले दिनों में मीडिया में लाल कृष्ण अडवानी, सुषमा स्वराज, यशवंत सिन्हा और शत्रुध्न सिन्हा जैसे भाजपा नेताओं के गड़े मुर्दे उखड़ जाएं। इस काम में मोदी को अमरीका की पीआर फर्म ‘एपको वर्ल्डवाइड’ का हर मुमकिन साथ मिल रहा है। अमरीका में रह रहे अपने कई अनिवासी भारतीय मित्रों की सलाह पर मोदी ने सर्वप्रथम अगस्त 2007 में पीआर कंपनी ‘एपको’ की सेवाएं ली थीं। तब से लेकर आज तक यह कंपनी मोदी और गुजरात को एक ब्रांड के तौर पर स्थापित करने में जुटी है। ‘वायब्रेंट गुजरात’ कैंपेन का आइडिया भी इसी कंपनी  का बताया जाता है। सनद रहे कि अमिताभ बगान को गुजरात का ब्रांड एंबेसेडर बनाने और मोदी के लिए ‘नमो’ विशेषण प्रचारित करने में इसी कंपनी की भूमिका थी। सन्  2009 में मोदी ने इस कंपनी के साथ अपने करार को पुन: रिन्यू किया और बताया जाता है कि इस कंपनी के प्रयासों से अब तक गुजरात में 153बिलियन अमरीकी डॉलर का निवेश आ चुका है। इस कंपनी ने ‘वन इस्त्रायल’, ‘वन मलेशिया’ जैसे कई सफल राजनीतिक कैंपेन को परवान चढ़ाया है। भारत में इस कंपनी का आॅपरेशन मीडिया विशेषज्ञ सुकांति घोष देखते हैं।
 
कांग्रेस में इमेज चमकाने की होड़

अपने युवराज राहुल गांधी की देखा-देखी इनके कई दरबारी मंत्री भी अपनी इमेज चमकाने में जुट गए हैं। सूत्र बताते हैं कि पी.चिदंबरम, कपिल सिब्बल और मनीष तिवारी समेत कई कांग्रेसी मंत्रियों ने अपनी इमेज चमकाने के लिए अलग-अलग पीआर एजेंसियों का सहारा लिया है। वहीं राहुल की हालिया डांट के बाद कांग्रेसी मंत्रियों के तेवर भी ढीले हुए हैं और विपक्ष पर हमला साधने में वे शब्दोंं का भी सोच-समझकर चयन कर रहे हैं।

दिल तो बगाा है जी।

कहते हैं इश्क व मुश्क छुपाए नहीं छुपते, कांग्रेस के एक बड़े और बड़बोले नेता के साथ भी ऐसा ही है। वे एक बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं, अपने मुख्यमंत्रित्व काल में इनका दिल एक एंग्लो इंडियन महिला पर आ गया। इस एंग्लो इंडियन युवती की मां श्रीमती इंदिरा गांधी की गवर्नेंस रह चुकी हैं। तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री साहब को बखूबी इस बात का इल्म था कि यह एंग्लो इंडियन युवती शादी-शुदा है, पर दिल तो बगाा है जी, वे अपने इश्क के तूफां को कहां रोक पाए और उन्होंने उस युवती को एंग्लो इंडियन कोटे से विधान परिषद में नॉमिनेट कर दिया और युवती के वकील पति को राज्य का एटॉर्नी जनरल नियुक्त कर दिया। आज की तारीख में वह युवती जो अब एक परिपक्व महिला हो चुकी है अपने पति और बेटी के साथ दिल्ली से सटे नोएडा में रहती है। पति और बेटी दोनों ही सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते हैं। नेताजी अब भी इस महिला के निरंतर संपर्क में हैं, पर जब मियां-बीवी राज़ी तो क्या करेगा काज़ी। समझा जाता है कि इस राजनेता के देश के तीन शीर्ष उद्योगपतियों की कंपनियों में 100 करोड़ से ज्यादा का निवेश है।

राजनाथ के बड़े मंसूबे
भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह जब से अमेरिका से लौट कर स्वदेश आए हैं उनके इरादे बम-बम हैं, बड़े बोल और बड़े फैसलों के हिमायती हो गए हैं, उनके राजनैतिक सलाहकारों और ज्योतिषियों ने उन्हें समझा दिया है कि ‘भाजपा की ओर से बस दो ही लोग प्रधानमंत्री बनने की रेस में हैं-एक नरेंद्र मोदी, दूसरे स्वयं राजनाथ। नरेंद्र मोदी की पार्टी और पार्टी से बाहर उनकी स्वीकार्यता को लेकर कई प्रश्नचिन्ह लगे हुए हैं। वहीं राजनाथ के नाम का कोई विरोध नहीं, चुनांचे 2014 में उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं कहीं कम नहीं।’ राजनाथ के पांव अब जमीं पर कम, मंदिरों व गुरूओं के दरबार में ज्यादा पड़ रहे हैं। अभी हालिया दिनों में उन्होंने असम के प्रख्यात कामाख्या देवी मंदिर में एक बड़ा यज्ञ करवाया है और इस यज्ञ के निहितार्थ क्या हैं, यह कोई छुपी बात नहीं रह गई।

मोदी को धन देने की होड़

भाजपा से सहानुभूति रखने वाले प्रमुख उद्योगपतियों से नरेंद्र मोदी ने निरंतर संपर्क बनाया हुआ है। सूत्र बताते हैं कि मोदी ने इन उद्योगपतियों से साफ कह रखा है कि वे भाजपा के किसी नेता को व्यक्तिगत तौर पर फंड न करें, उन्हें जो भी पैसा देना है वह पार्टी के केंद्रीय कोष में जमा कराएं। मोदी ने साफ कर दिया है कि आने वाले चुनाव में हर भाजपा प्रत्याशी को कितना धन दिया जाना है इसका निर्धारण वे स्वयं करेंगे। पर उड़ती चिड़िया के पर गिनने में माहिर थैलीशाह मोदी के मंतव्य को भली-भांति भांप गए हैं और इनमें से कईयों ने तो अभी से मोदी को चंदा देना शुरू कर दिया है। देश के एक बड़े उद्योगपति ने तो वादा किया है कि मोदी की इमेज व ब्रांड बिल्डिंग में जितना पैसा खर्च हो रहा है इसका व्यय वे स्वयं वहन करेंगे। सूत्र बताते हैं कि गुजरात से भावनात्मक लगाव रखने वाले इस उद्योगपति ने अभी से इसका खर्च उठाना भी शुरू कर दिया है।  

दलबदल की होड़

चुनावी मौसम आ चुका है, लिहाज़ा सियासत में एक-दूसरे के घर आने-जाने की रवायतें भी शुरू हो गई हैं। नरेंद्र मोदी के चुनावी प्रचार की बागडोर संभालने के बाद से भाजपा के बाज़ार भाव में इजाफा हुआ है। सो, अन्य दलों के कई नेता भाजपा ज्वाइन करने को तैयार बैठे हैं। हैरत की बात तो यह कि इन कतारबद्द नेताओं में कांग्रेसी नेताओं की संख्या सबसे ज्यादा है। हरियाणा के एक बड़े बिजनेसमैन टर्न राजनेता ने भी हालिया दिनों में भाजपा के कुछ शीर्ष नेताओं से मिलकर पाला बदल की इ छा जतायी है। सनद रहे कि ये फिलहाल कांग्रेस में हैं और कांग्रेस को चुनावी चंदा देने में उनका कोई सानी नहीं। मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा कांग्रेसी नेता पाला बदल को इ छुक बताए जाते हैं।

...और अंत में

आखिर बकरे की मां कब तक ख़ैर मनाएगी। 2जी मामले में भयंकर उथल-पुथल लाने वाली देश की एक प्रमुख कारपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया को लेकर कोर्ट का रूख सख्त हो सकता है। सूत्र बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के कहने पर नीरा राडिया मामले को जांच के लिए सीबीआई के सुपुर्द किया जा सकता है।  (एनटीआई)

Thursday, 11 July 2013


समाचार विस्फोट के दो वर्ष पूरे, अब सप्ताहिक भी होगा प्रकाशित
नागपुर से प्रकाशित हिंदी मासिक पत्रिका समाचार विस्फोट ने सफलतापूर्वक दो वर्ष पूरा कर लिए हैं। अगस्त, 2011 से शुरू हुई यह मासिक पत्रिका ने समाचारों के वैचारिक तेवरों के साथ तेजी से महाराष्टÑ, छत्तीसढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, झारखंड, बिहार एवं ओडिशा के कुछ क्षेत्रों में प्रसार किया हैं।
गत दो वर्षों दो वर्ष में समाचार विस्फोट को पाठकों से मिले रिस्पांस को देखते हुए इसका अन्य क्षेत्रों में भी प्रसार किया जा रहा है। संभावना है कि अगस्त महीने से ही समाचार विस्फोट छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से टेबुलाइट साइज में साप्ताहिक संस्करण के रूप में प्रकाशित होगा। यही से इसे देशभर में प्रसार की योजना है। साप्ताहिक समाचार विस्फोट को ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक पहुंचाने के लिए देश भर से प्रतिनिधियों को जोड़ने का क्रम जारी है। समाचार विस्फोट से स्वतंत्र रूपे से जुड़ने के इच्छुक पत्रकार samachar.visfot@gmail.com संपर्क कर सकते हैं।
 
 
 

Thursday, 23 May 2013

samachar visfot may 2013


भारतीय बाजार से चीन मालामाल

--------------------ॅ-----------------
भारत के बड़े बाजार में धंधा कर चोखा मुनाफा बटोरने वाली कंपनियों की दो जमात है। एक वह जो अपने उत्पाद में थोड़ी बहुत गुणवत्ता देकर भारतीय व्यापारियों के ग्राहकों को लुभा रहे हैं, दूसरे वे हैं जो घटिया उत्पाद या धोखा देकर भारतीय व्यापारी, कपंनियां या ग्राहकों का पैसा हड़प ले रही हैं

----------------------------------------
संजय स्वदेश
पड़ोसी देश चीन कभी भी भारत का विश्वस्त नहीं रहा। लेकिन वैश्विक स्तर पर बदले हालात और बाजार के प्रभाव के कारण कूटनीतिक स्तर पर हमेशा दोनों देशों के संबंधों को सकारात्मक बनाये रखने की पहल दोनों देशों की ओ से होती है। वैश्विक स्तर पर मजबूत होते भारत के कदम चीन की आंखों में हमेशा खटकता रहा है। लिहाजा, चीन ने हमेशा से हर मोर्चे पर भारत को कमजोर करने की कोशिश करता रहा है। कभी सीमा में घुसपैठ करके तो कभी देश के महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों के वेबसाइटों साइबर धावा बोलकर मानसिक रूप से अशांत करता है। लेकिन आर्थिक स्तर पर चीन भारत को जिस तरह से खोखला कर रहा है, वह निश्चय ही गंभीर है। मीडिया में भारतीय सीमा पर चीनी सैनिकों की हलचल की खबरों पर नजर ज्यादा रहती है, लेकिन इस हलचल के पीछे चीन से जुड़े आर्थिक मुद्दे अक्सर गौड़ होते गए हैं।
करीब दशक भर पहले जब चीनी माल भारत में सस्ते दामों में पहुंचा तब लोगों ने हाथों-हाथ लिया। हालांकि चीन अभी भी भारत की हर जरूरत की समान यहां तक ही हमारे भगवान की मूर्तियों तक को भेज रहा है। शुरुआती दिनों में वस्तुओं की गुणवत्ता इतनी खराब निकली कि धीरे-धीरे  लोगों को विश्वास चीनी वस्तुओं से उठने लगा। लेकिन शुरुआती दौर में चीन ने भारती व्यपारियों को भीषण तरीके से मानसिक आघात पहुंचाया। अब भारत आने वाला चीनी माल में अब थोड़ी बहुत गुणवत्ता आने लगी है। यहीं कारण है कि  गुणवत्ता को लेकर टूटा जनता का विश्वास किफायती दाम के कारण फिर बहाल होने लगा है। आम भारतीय बाजार में ब्रांडेट कंपनियों का 20 से 40 हजार में मिलने वाला टेबवलेट चीनी ब्रांड में हूबहू  दो-चार हजार में उपलब्ध हो जा रहा है।
जो लोग ब्रांडेड टेबलेट नहीं खरीद पाते हैं, चीनी टेबलेट से टशन मारते हैं। यह तो केवल टेबलेट भर की बात है। खिलौना, देवी-देवताओं की प्रतिमाओं से लेकर, फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं चीनी उत्पाद भारत में उपलब्ध हैं।
समझदार भारतीय उपभोक्ता अब किफायती दर के साथ गुणवत्ता की तुलना कर वस्तुओं को चुनने लगा है। चीन से आयातित सस्ती वस्तुओं से भारतीय कारोबारियों और निर्माताओं पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। सबसे अधिक नुकसान भारत के छोटे और मझौले उद्यमियों पर पड़ा है। भारत के बड़े बाजार में धंधा कर चोखा मुनाफा बटोरने वाली कंपनियों की दो जमात है। एक वह जो अपने उत्पाद में थोड़ी बहुत गुणवत्ता देकर भारतीय व्यापारियों के ग्राहकों को लुभा रहे हैं, दूसरे वे हैं जो घटिया उत्पाद या धोखा देकर देशी व्यापारी, कपंनियां या ग्राहकों का पैसा हड़प ले रही हैं।
हालही में चीन से व्यापार करने वालों को भारतीय दूतावास ने खबरदार करते हुए सचेत रहने को कहा। पिछले वर्ष 86 भारतीय कंपनियों को चीनी कपंनियों ने धोखा दिया। धोखा खाने वाले छोटे और मझोले स्तर के भारतीय कारोबारी थे। दिया है कि भारतीय कंपनियां कोई भी कारोबारी समझौता करने से पहले चीनी कंपनियों की जांच-परख कर लें। जो चीनी चीनी कंपनियां धोखाधड़ी में शामिल पाई गर्इं है, वे रसायन, स्टील, सौर उर्जा के उपकरण, आॅटो व्हील, आर्ट एंड क्राफ्ट्स, हाडर्वेयर और बायोलॉजिकल टेक्नोलॉजी के कारोबार से जुड़ी हैं। ऐसे मामले भी सामने आए हैं जब भारतीय कंपनियों ने चीन से मशीनरी मंगवाई। जब इसकी इंस्टालेशन करने के बाद काम शुरू किया तो मशीन चली ही नहीं। चीनी वेबसाइट देखकर भारतीय व्यापारी सामान खरीदने को आर्डर देते हैं। चीनी कंपनियां उनसे पैसा तो ले लेती है, लेकिन बाद में सामान भेजती ही नहीं। भारतीय दूतावास ऐसी धोखेबाजी चीनी कंपनियों की सूची आॅनलाइन उपलब्ध करा रहा है। चीनी कंपनियों की धोखेबाजी के धंधे से अलग अनेक चीनी कंपनियां भारत में बेहतर धंधा कर मालामाल हो रही हैं। देश की प्रतिष्ठित औद्योगिक संगठन का दावा हैकि चीन भारतीय अर्थव्यवस्था को किसी भी तरह से नुकसान पहुंचाने का खतरा नहीं उठा सकता है क्योंकि उसके भारत से व्यापक व्यापारिक हित जुड़े हुए हैं। भारत के बढ़ते बाजार में चीन की हिस्सेदारी में बड़ी तेजी से बढ़ोतरी हुई है। फिलहाल चीन का भारत में वार्षिक कारोबार 40 अरब डॉलर यानी की करीब 2 लाख 22 हजार करोड़ रुपये हो रहा है। संभावना है कि चालू वित्त वर्ष में यह आंकड़ा बड़ 44 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। एसोचैम का सुझाव है कि भारत और चीन को आपस में व्यापारिक अंतर को पाटने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
-----------------------

संजय स्वदेश

Wednesday, 20 March 2013

प्राचीन भाषा की हत्या का उपक्रम

संदर्भ : सिविल सेवा परीक्षा से पाली को हटाना

तर्क देने वाले कह सकते हैं कि आज पालि बोलता कौन है? यही सवाल संस्कृत और उर्दू को लेकर भी उठाया जा सकता है। संस्कृत बोलने वाले एक प्रतिशत लोग भी देश में नहीं है। जिस भाषा से रोजगार उपलबध होती है, वह उतना ही समृद्ध होती है। रोजगार उपलब्ध करा कर ही अंग्रेजी ने हिंदी को मात दे दी। पाली संस्कृत को पछाड़ रही है।
संजय स्वदेश

संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा के पाठ्यक्रम से अंग्रेजी की अनिवार्यता को फिलहाल रोक कर के केंद्र सरकार ने खूब वाहवाही बटोरी। यह खबर कई प्रमुख समाचारपत्रों के प्रमुखता से प्रकाशित हुई। हिंदी प्रेमियों ने खूब स्वागत किया। लेकिन इसी के साथ आयोग ने भारत की प्राचीन भाषा पालि का गला घोंट दिया। किसी को कोनोकान खबर नहीं लगी। पालि भाषा एवं साहित्य अनुसंधान परिषद ने इसके खिलाफ आवाज उठाई। पर अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता है। न कहीं शोर सुनाई दिया और न ही कई कोई बड़ा विरोध। आयोग की परीक्षाओं से अंग्रेजी की अनिवार्यता को हटाने के लिए वर्षों आंदोलन चले। करीब एक दशक पहले की बात है तब आयोग के मुख्य द्वार पर हिंदी समर्थित विरोधियों का एक तंबू हमेशा दिखता था। वहां के बैनर पर यह लिखा होता था कि हिंदी के समर्थन में चलने वाला देश में अब तक का सबसे बड़ा आंदोलन। एक बार दिल्ली में शाहजहां रोड़ से गुजरते वक्त किसी ने बताया था कि इसके समर्थन में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज उतर चुके हैं। लेकिन कब उस आंदोलन का दम घुट गया और प्रदर्शनकारियों का तंबू हट गया, किसी को कानोकान खबर नहीं चली। ऐसे समय में जब न कोई आंदोलन था और न ही कहीं से कोई दबाव। आयोग ने हिंदी के प्रति हमदर्दी दिखाते हुए अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त कर देने की घोषणा कर दी। बात असानी से हजम नहीं होती। जब समाज में अंग्रेजी का भूत भूत सवार हो रहा हो, तब अपने आप आयोग ने आखिर रहमदिली क्यों दिखाया। ढेरों ऐसे प्रतिभाशाली लोग हैं जिन्होंने आयोग की अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण परीक्षा में असफलता की मुंह खाई। लेकिन अन्य क्षेत्रों में सफलता के शिखर पर पहुंचे। फिलहाल चर्चा, आयोग के पाठ्यक्रम से पालि को हटाने को लेकर है। प्राचीनकाल की जनभाषा और धार्मिक अल्पसंख्यकों बौद्धों की एक मात्र भाषा को हटाने के पीछे आयोग की क्या मंशा रही, इसे न ही उसने बताना उचित समझा और न ही सार्वजनिक रूप से समझाना। पालि भषा के विषय को लेकर सिवलि सेवा की मुख्य परीक्षा देने वाले प्रतिभागियों की संख्या हजारों में है। जिसमें से अधिकतर प्रतिभागी सफलता को प्राप्त करते हैं। मजेदार बात यह है कि सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा में इस भाषा को ऐच्छिक विषय के रूप में चुनने वाले अधिकतर प्रतिभागी दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदाय से होते हैं। आयोग के कठिन मापदंडों के कारण ही वर्षों से आरक्षित वर्ग के भरपूर अफसर बनाने में पूरी तरह से नकाम रहे हैं। शीर्ष सेवा में सैकड़ों पद आरक्षित वर्ग के रिक्त पड़े हैं।
महंगे और पहुंच से दूर पाठ्यक्रमों में दाखिला नहीं मिलने के कारण हर वर्ष हजारों विद्यार्थी पालि और बौद्ध अध्ययन में दाखिला लेते हैं। हालात तो यह है कि एक ओर जहां विश्वविद्यालयों के संस्कृत विभाग में सन्नाटा पसरता जा हरा है, वहीं पालि और बौद्ध अध्ययन के विभाग गुलजार होने लगे हैं। इसके बाद भी बिना किसी ठोस तर्क दिए बगैर पालि के प्रति यूपीएससी की  मनमानी उसकी साकारात्मक मंशा को जाहिर नहीं करती है। दलित, आदिवासी और पिछड़े हमेशा ही इस बात को लेकर यह शोर मचाते रहे हैं कि जिन कठिन राहों को वे अपनी मेहनत से आसान बना रहे हैं नीति नियंता किसी न किसी तरह से उनके राह में और अड़ंगा डालते हैं। सिविल सेवा परीक्षा से पालि का हटाना देश के उन हजारों युवाओं के सपने तोड़ने जैसा है जो पालि का अध्ययन कर रहे हैं और इस विषय के साथ देश की सर्वोच्च प्रतिष्ठित सेवा क्षेत्र अपनी काबिलियत सिद्ध करना चाहते हैं।
सिविल सेवा की परीक्षा में संस्कृत, उर्दू और पंजाबी को अभी भी रखा गया है। जैसे संस्कृत हिंदुओं से, उर्दू मुस्लिमों से तथा पंजाबी सिक्खों से संबंधित है। वैसे ही पालि बौद्ध धर्म के लोगों से संबंधित है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में इनकी संख्या बढ़ रही है। भविष्य में निश्चय ही समाज में इस भाषा की प्रतिष्ठा और रूढ़ होगी। तर्क देने वाले कह सकते हैं कि आज पालि बोलता कौन है? यही सवाल संस्कृत और उर्दू को लेकर भी उठाया जा सकता है। संस्कृत बोलने वाले एक प्रतिशत लोग भी देश में नहीं है। संस्कृत भाषा के प्रति बचे खुचे लोगों का भी मोहभंग हो रहा है। विभिन्न विश्वविद्यालयों में संचालित संस्कृत के पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए पर्याप्त संख्या में विद्यार्थी भी नहीं पहुंच रहे हैं। लेकिन पालि भाषा की स्थिति संस्कृत से उलट है। वर्तमान समय में पालि को लगभग 55 विश्वविद्यालयों में पालि एवं बौद्ध अध्ययन विषयों का अध्यपन हो रहा है। विदेशों को छोÞड़कर सिर्फ भारत में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग हर साल दो बार यूजीसी नेट एवं जेआरएफ की परीक्षा पालि भाषा में भी आयोजित करवा रहा है। सभी लगभग 55 विश्वविद्यालयों और उनके संबंद्ध कॉलेजों में स्रातक, एमए, एमफिल, पीएचडी की उपधियां दी जाती है। इसके साथ ही पालि भाषा एवं साहित्य में प्रमाण-पत्र, डिप्लोमा एवं पालि आचार्य की भी उपाधि दी जाती है। इतना ही नहीं वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, बिहार माध्यमिक शिक्षा बोर्ड एवं महाराष्टÑ माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में भी पालि भाषा विषय की पढ़ाई हाई स्कूल एवं इंटरमीडिएट कक्षाआ में होती है। इसके अलावा देशभर के करीब पचास से ज्यादा विश्वविद्यालयों में पाली भाषा विभाग संचालित है। पालि भाषा के बिना प्राचीन भारतीय इतिहास को जनाना कठिन ही नहीं, अपितु असंभव भी है, क्योंकि पालि भाषा भारत देश की प्राच्य भाषाओं (पालि,प्रकृत व संस्कृत) में से एक महत्पूर्ण भाषा है। ऐतिहासिक महत्व की दृष्टि ही नहीं बल्कि सार्क देशों और दक्षिणी एशियाई देशों के साथ हमारी विदेश नीतियों को भी यह भाषा प्रभावित करती है। क्योंकि इन देशों में बौद्ध धर्म का प्रभाव ज्यादा है। तमाम सार्थक बिंदुओं की अनदेखी करते हुए केवल पालि भाषा को यूपीएसी की परीक्षा से अचानक हटाने का निर्णय अदूरदर्शिता नहीं है। जिस भाषा से रोजगार उपलबध होती है, वह उतना ही समृद्ध होती है। रोजगार उपलब्ध करा कर ही अंग्रेजी ने हिंदी को मात दे दी। पाली संस्कृत को पछाड़ रही है। ऐसे समय में जब यूपीएससी द्वारा पालि को पाठ्यक्रम से हटाने का निर्णय इसका गला घोंटने से कम नहीं है।