Thursday, 14 February 2013
Thursday, 7 February 2013
बांझ मर्दों की बढ़Þती फौज
एक समय था, जब किसी निसंतान महिला को बांझ कर कह न केवल मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था, बल्कि उसे घर-परिवार के साथ समाज में भी दूसरे कोटी का मान लिया जाता था। समय बदला तो महिलाओं के माथे से ऐसे कलंक हटने लगे लगे। ए कलंक अब पुरुषों के माथे पर आने लगी है। विज्ञान ने यह हकीकत बताई कि संतान नहीं होने का एकमात्र कारण किसी महिला का बांझ होना नहीं है, बल्कि बांझ तो पुरुष भी हो सकते हैं।
अब केवल महिलाएं बांझ नहीं होती। अब मर्द भी इस कतार में खड़े हैं। मजेदार बात यह है कि बांझ मर्दों की फौज लगातार बढ़Þ रही है। इस समस्या को दूर करने का मेडिकल धंधा भी सधे हुए कदमों से पांव पसार रहा है। देश के प्रमुख शहरों में मर्दों के बांझपन के इलाज के लिए अलग से सेंटर खुल गए हैं। अश्चर्य की बात तो यह है कि अनेक युवाओं को यह पता ही नहीं कि वे आधुनिक जीवन शैली में बाप बनने की ताकत खो चुके हैं। मेडिकल कंपनियां इन्हें एक बाजार के रूप में देख रही है।
देवांशु नारायण
ज्यादा से ज्यादा धन की चाहत और बदलते समाज और परिदृश्यश् में तनाव से ग्रसित मर्द भी बांझपन का शिकार होने लगा है, ताजा शोध और डाक्टरों से जो जानकारी मिलती है वह चौंकाने वाली है। वजह चाहे जो भी हो, लेकिन हमेशा समाज ने महिलाओं के बारे में ज्यादा सोचा और बांझपन का ताज उन्हीं पर मढ़ा गया। शोध बताता है कि संतानहीनता में अब पुरुष भी बड़े कारण बन गए हैं। जिसमें शुक्राणुओं के नए मामले, तनाव से परेशानी, लोगों की जीवनशैली, मोटापे की महामारी और अत्यधिक दवाइयों का सेवन मुख्य कारक बताए गए हैं।
दो साला पहले की एक रिपोर्ट है। उसके अनुसार आज के पुरुष प्रधान समाज के 10 प्रतिशत युवा पुरुषों के शुक्राणुओं की गुणवत्ता, मात्रा और निर्माण में भारी कमियां पाई गई हैं। साथ ही 6 प्रतिशत पुरुष बांझपन और 14 प्रतिशत अंडाशय संबंधी विफलता क्रोमोसोम में गड़बड़ी के कारण बाप बनने की क्षमता खो चुके हैं। रिपोर्ट में बांझपन के कारण 40 प्रतिशत पुरुष, 40 प्रतिशत महिलाएं तथा 20 प्रतिशत अभी भी अभूझ बने हुए हैं। ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं हैं, बल्कि पिछले 50 वर्षो में दुनिया भर के पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या 50 फीसदी कम हो गई है। डॉक्टर मानते हैं कि पुरुष में बांझपन के कारण और इसे कम करने के लिए मेडिकल साइंस को और शोध की जरूरत है। शोध रिपोर्ट के मुताबिक जानकारी मिलती है, वह मर्दों की नींद उड़ाने के लिए काफी है।
आश्चर्य की बात तो यह है कि अनेक युवा ऐसे हैं तो बांझपन के अदृश्य बीमारी से ग्रस्त हो चुके हैं। उन्हें इस बात का पता भी नहीं है कि वे भविष्य में बाप बनने कीक्षमता खो चुके हैं। रिपोर्ट के मुताबिक आज हमारे देश और प्रदेश में पांच में से एक दंपती निसंतान है। यह आंकड़ा स्थिर नहीं है। हर वर्ष निसंतान दंपतियों की संख्या बढ़Þती जा रही है। शहरों की 16 प्रतिशत महिलाएं निस्संतान हैं। भारत में 1981 के बादे से शहरी क्षेत्रों में संतानहीनता के मामले में 50 प्रतिशत की बढ़Þोतरी हुई है। पुरुष के मुख्य कारणों में 37 प्रतिशत वैरीकोसील, 25 प्रतिशत इंजियोपैथिक, 10 प्रतिशत शुक्राणुओं में गड़बड़ी, 9 प्रतिशत अंडकोष में खराबी बताया गया है। वहीं महिलाओं में बांझपन की समस्याएं लंबे अरसे से जुड़ी हैं, जिसमें 37 प्रतिशत से उम्र का अधिक होना, 22 प्रतिशत फैलोपियन ट्यूब की समस्या, 20 प्रतिशत पालीसिस्टिक ओवरी, 18 प्रतिशत जननांगों में टीवी और 10 प्रतिशत आनुवांशिक समस्याएं का होना है।
आंकड़ों के मुताबिक भारत के 9 करोड़ पुरुष बाप होने की क्षमता की कमी के शिकार हो चुके हैं। इस आंकड़े को बढ़Þते देख मेडिकल कंपनियां इन्हें एक बड़े उभरते हुए बाजार के रूप में देख रही है। अनुमान के आधार पर विशेषज्ञ कहते है कि देश में बांझपन के इलाज के लिए उपयोग होने वाला दवा का कुल करोबार करीब 90 करोड़ से एक अरब तक का हो चला है। यह यह दवा का बाजार फिर फलफूल रहा है। इसके साथ ही इसके उपचार का करोबार हर साल 20 से 30 प्रतिशत की दर से आगे बढ़Þ रहा है।
हाल ही में प्रकाशित एक प्रतिष्ठित पत्रिका की रिपोर्ट के मुताबिक देश में बांझपन के इलाज के लिए 40 हजार चक्र चलते हैं, जबकि 2000 में इसकी संख्या सिर्फ 7 हजार थी। आज के समाज या वर्ग में शिक्षित युवा की संख्या ज्यादा है, वे किसी भी तकलीफ या परेशानी में तुरंत डाक्टरों से मिलते हैं और खुलकर बात करते हैं। अगर दंपतियों की बात माने तो उनका कहना होता है कि घर, परिवार और समाज को देखते हुए बच्चों का जीवन में होना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। कई मामले तो ऐसे भी रहे हैं जहां भारतीय परंपरा में लक्ष्मी की संज्ञा प्राप्त नारियों को फरमान तक सुना दिया जाता है कि इतने समय के अंदर आपको बच्चे पैदा करना है, अगर नहीं तो पुरुष दूसरी शादी करता है और पहली लक्ष्मी आत्महत्या, आत्मदाह या आकाल मृत्यु को अपनाती है। जरा सोचिए इस विषय पर कि क्या इसका दोषी सिर्फ महिलाएं हैं, तो उत्तर मिलेगा नहीं, कहीं न कहीं पुरुष भी जींदगी की उहा-पूह में बांझपन के शिकार हो गए हैं। भारत में बच्चा पाने या जन्म देने की भी कीमत और इलाज हैं। जैसा इलाज वैसी कीमत। अगर आइयूआई के तहत गर्भाधारण किया जाता है तो इसमें 3 से 15 हजार तक खर्च आते हैं। एक अन्य इलाज में आइवीएफ के तहत गर्भाश्य को दवा के जरिए अंडाणु पैदा करने के लिए प्रेरित किया जाता है, फिर उन्हें गर्भाशय से बाहर निकालकर निषेचित किया जाता है, भ्रूण को वापस गर्भ में रख दिया जाता है और इसमें प्रति चक्र 50 हजार से 1 लाख 50 हजार तक खर्च हो जाते हैं। इसी तहत तीसरी विधि आसीएफआई में लैब में प्रत्एक अंडाणु में एक शुक्राणु डालकर उन्हें निषेचित किया जाता है और इसमें 80 हजार से 1 लाख 50 हजार खर्च हो जाते हैं।
आज के समाज में 17 प्रतिशत बांझ स्त्रियों को वैवाहिक समस्याएं झेलनी पड़ती है। बच्चे वाली 2 प्रतिशत के साथ भी ऐसा होता है। मुंबई की डॉ. फिरूजा कहती हैं कि दंपती आजकल बहुत एहतियात बरतते हैं, वे सामान्य बात पर जनरल फिजिशियन या स्त्रीरोग विशेषज्ञों से मिलने के बजाए सीधे इनफर्टिलिटी विशेषज्ञ से मिलने जाते हैं। डॉ. इंदिरा बताती हैं कि बांझपन की समस्या सरकार की योजनाओं में शामिल नहीं हैं, निस्संतान दंपतियों को बच्चा पैदा कराने में मदद कराने का कोई प्रावधान नहीं है। एबरडीन डॉ. शिलादित्य का कहना है कि संतानहीनता की परिस्थितियों का पूरा ज्ञान न होना लोगों का जीवन बरबाद कर सकता है। विकासशील देशों में इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य का मामला मानना चाहिए।
लेखक परिचय
देवांशु नारायण : युवा पत्रकार। पटना से मंजिल की तलाश में म.प्र. सागर सेंट्रल यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता की पढ़ाई, वहीं दैनिक भास्कर में रिर्पोटिंग और अखबार की व्यवहारिक टेÑनिंग। पटना मौर्य टीवी में छह माह तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के तानेबाने के साथ झूठों की फौज को समझा। अब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में दैनिक हरिभूमि के संपादकीय सहयोगी के रूप में समाचार जगत को जानते-समझते बेहतर पत्रकारिता का भविष्य देख रहे हैं।
'बेडरूम संकट' से जूझते दुनिया भर के मर्द!
from bbc
भागती आधुनिक जीवनशैली, इससे उत्पन्न तनाव, इस तनाव से बचने के लिए सिगरेट और शराब का सहारा- पुरुषों को बेडरूम में निष्क्रिय बना रहा है। कभी मर्दानगी पर इतराने वाले मर्द अब अपनी महिला साथी से नजरें चुराने लगे हैं।
यह खबर पढ़कर अजीब लगे, लेकिन पूरी दुनिया के मर्दों के सामने 'बेडरूम संकट' मुंह बाए खड़ा है। नपुंसकता, बांझपन और शीघ्रपतन की समस्या ने बेडरूम के अंदर दुनिया भर के मर्दों का विश्वास हिला दिया है। अनियमित खानपान, खानपान में पोषकता का अभाव, फास्ट फूड और कोल्डड्रिंक पर बढ़ÞÞती निर्भरता, शारीरिक श्रम में कमी, तेज भागती आधुनिक जीवनशैली, इससे उत्पन्न तनाव, इस तनाव से बचने के लिए सिगरेट और शराब का सहारा- पुरुषों को बेडरूम में निष्क्रिय बना रहा है। कभी मर्दानगी पर इतराने वाले मर्द अब अपनी महिला साथी से नजरें चुराने लगे हैं।
फ्रांसिसी मर्द पर हाल ही में हुए एक अध्ययन ने दर्शा दिया है कि न केवल फ्रांस के मर्द, बल्कि पूरी दुनिया के पुरुष बेडरूम में संकट का सामना कर रहे हैं। आधुनिक जीवनशैली के कारण मर्दो के वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या लगातार कम हो रही है। यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब 'शुक्राणु विहीन वीर्य' हर देश के पुरुषों की समस्या बन जाएगी।
'ह्यूमन रिप्रोडक्शन' नाम के जर्नल में छपे शोध के मुताबिक फ्रांस में 26,600 मर्दों के वीर्य का परीक्षण किया गया। परीक्षण में पाया गया कि 16 वर्षों के भीतर इन मर्दों में 32.3% शुक्राणु घटे हैं। मतलब फ्रांसिसी मर्दों के शुक्राणुओं की संख्या साल 1989 से साल 2005 के बीच एक तिहाई गिरी है। वैसे जीव विज्ञानियों का मानना है कि पुरुषों के वीर्य में जो शुक्राणुओं की संख्या है वह अभी भी प्रजनन के लिए पर्याप्त है, लेकिन जिस दर से शुक्राणु क्षरण हो रहा है वह भविष्य के लिए चिंता का विषय है।
इस अध्ययन से जुड़े डॉक्टर जोएल ला मोए इसे गंभीर चेतावनी करार दे रहा है। उनका कहना है कि शुक्राणुओं के परीक्षण के लिए बड़े पैमाने पर किया गया यह अपनी तरह का पहला अध्ययन है, जो दर्शा रहा है कि पुरुषों के वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या में लगातार कमी जन स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
ब्रिटेन के शेफील्ड विश्वविद्यालय के डॉक्टर एलन पेसी कहते है, शुक्राणुओं की संख्या में पाई गई गिरावट वैसे तो अब भी 'नॉर्मल रेंज' में है। उनके अनुसार, नर प्रजनन के लिए प्रति मिलीलीटर डेढ़ करोड़ शुक्राणुओं की जरुरत होती है। अध्ययन में प्रति मिलीमीटर चार करोड़ से अधिक शुक्राणु पाए गए हैं। लेकिन शुक्राणुओं की संख्या में कमी आ रही है, इससे इनकार तो नहीं ही किया जा सकता है।
आधुनिक लाइफस्टाइल में गड़बड़ ही गड़बड़ है
एडिनबरा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रिचर्ड शार्प के अनुसार, हमारे आधुनिक लाइफस्टाइल में सबकुछ गड़बड़ है। अनियमित खान-पान और खानपान में जिस तरह से रसायनों का प्रयोग हो रहा है यह सब शायद उसी का असर है। वैसे इसके अहम कारणों को खोजा जाना चाहिए, क्योंकि मुद्दा गंभीर है।
आधुनिक जीवनशैली, वसा युक्त भोजन, हमारे जीवन में रसायनों की बढ़ÞÞती मौजूदगी, काम का बढ़ÞÞता दबाव और उससे उत्पन्न तनाव, सिगरेट और शराब ने उस अंग पर चोट किया है, जो मर्दों के लिए 'मर्दानगी' का पर्याय है। आखिर पुरुषों की 'मर्दानगी' की हेकड़ी 'लिंग दंभ' की वजह से ही तो है...और 'लिंग शिथिलता' ने इस हेकड़ी की हवा निकालने की शुरुआत कर दी है...भले ही अभी यह फ्रांस में दिख रहा है, लेकिन यदि अध्ययन हो तो हर देश के मर्द का 'लिंग' उन्हें धोखा देता दिख जाएगा।
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आईपीओ से पैसे जुटाकर 87 कंपनियां फरार
नई दिल्ली। पिछले वित्त वर्ष के अंत तक ऐसी 87 लापता कंपनियां थीं जिन्होंने आईपीओ के जरिए राशि जुटायीं लेकिन बाद में उनका पता नहीं लग सका। कार्पोरेट मामलों के मंत्री सचिन पायलट का कहना है कि लापता कंपनियों की सूची में 238 कंपनियां हैं। इन कंपनियों में से 151 का पता लगा लिया गया है जबकि अन्य 87 कंपनियों का अभी तक पता नहीं चल सका है। 31 मार्च 2012 के आंकड़ों के अनुसार 87 कंपनियां ऐसी थीं जिन्होंने आरंभिक सार्वजनिक पेशकश (आईपीओ) के जरिए राशि जुटायी थी। सरकार और सेबी द्वारा ऐसे मामलों में नजर रखी जा रही है। देश में व्यापार शुरू करने के लिए माहौल में सुधार किया जा रहा है और इस संबंध में अधिकतर विलंब राज्य स्तरीय अनुमोदनों के कारण होता है। पायलट ने कहा कि देश में कारोबार शुरू करने के लिए विभिन्न प्रावधानों को आसान बनाया गया है और कंपनी को रजिस्टर करने के लिए लगने वाले समय को कम करते हुए इसे 48 घंटा कर दिया गया है। निदेशक की पहचान संख्या और कंपनी के नाम की उपलब्धता जैसे विषय को 24 घंटों के अंदर हल किया जा सकता है।
कंपनी विधेयक में शुद्ध लाभ का कम से कम दो प्रतिशत भाग कार्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) के तहत खर्च किए जाने के प्रावधान के संबंध में कंपनियों की ओर से कोई आपत्ति नहीं मिली है। मंत्रालय को कंपनी विधेयक में सीएसआर के प्रावधान को लेकर किसी कंपनी की ओर से कोई आपत्ति या विरोध नहीं मिला है। मंत्री पायलट ने शीतसत्र के दौरान संसद में कहा कि इस प्रावधान में यह भी कहा गया है कि अगर कोई कंपनी सीएसआर की राशि खर्च नहीं करती है तो उसे बोर्ड की रिपोर्ट में इसका कारण बताना होगा।
चिपक कर सोने का धंधा नया धंधा
एक घंटे में कमाती है तीन हजार
न्यूयॉर्क। बिस्तर पर एक लड़का-लड़की चैन की नींद सो रहे हैं। पहली नजर में आपको यह पति-पत्नी लगे, लेकिन हो सकता है कि इसी बिस्तर पर अगले कुछ घंटों में लड़की के सााि दूसरा शख्त हो। पलभर में ही आप लड़की के चरित्र पर सवाल खड़ा कर सकते हैं, लेकिन आपको बता दे कि यह लड़की पेशेवर कडलर (गले लगाने वाली) है। 29 साल की जैकी सैमुअल इस तरह अनजान मर्दों के साथ प्रतिदिन सोने के 360 डॉलर और एक घंटे के 60 डॉलर (करीब 14 हजार रुपए और 3 हजार रुपए) लेती है। पैसों की कमी के कारण जैकी ने इस काम को शुरू किया है। उनका कहना है कि इसमें कुछ भी बुरा नहीं है। मुझे अपनी पढ़ाई और अपने बच्चे के लिए यह काम करना पसंद है।
जैकी एक हफ्ते में तकरीबन 30 पुरुषों के साथ हमबिस्तर होती हैं, लेकिन इसमें कोई भी अश्लील हरकत नहीं की जाती। उनके यहां आने वाले लोगों में अपराधी से लेकर सैनिक भी होते हैं। जैकी बताती हैं कि फिर भी लोग इसे बुरा मानते हैं। हालांकि उनके इस काम धंधे से ज्यादा लोगों को खबर नहीं है, लेकिन उन्हें कॉलेज से निकालने की चेतावनी मिल चुकी है। कई बार जैकी के साथी छात्र उसे वेश्या तक कहते हैं। बकौल जैकी, मुझे बचपन से पता है कि चिपक कर कैसे सोया जाता है। चिपक कर सोना शरीर के लिए भी लाभदायक है। इसमें आध्यात्म और फन का मिश्रण भी हैं। जैकी सोचती है कि उनके यहां आने वाले लोगों के जीवन में कई परेशानियां हैं। उनके कुछ पुराने ग्राहक ऐसे हैं, जिनकी पत्नियों की मौत हो चुकी है। कुछ ऐसे हैं, जो पहली बार लड़की के साथ सोना चाहते हैं। कुछ अपनी घरेलू समस्याओं से ग्रस्त है। जैकी अपनी सर्विस की आॅनलाइन प्रचार भी करती हैं।
इस धंधे में जैकी ने अंर्तवस्त्रों से ढके शरीर के किसी भी हिस्से को छूने पर पाबंदी रखती है। सोते समय वह पाजमा पहनती हैं। किसी तरह की अश्लील हरकत वह बर्दाश्त नहीं करती है। फिलहाल उसका यह बिजनेस इतना अच्छा चल रहा है कि उन्होंने एक और लड़कीको अपना सहयोगी बना कर रख लिया है। कई बार ऐसा भी होता है कि ग्राहक दो औरतों के साथ सोना चाहता है। कई बार ऐसा भी होता है कि जैकी को अश्लील फोन और ई-मेल आते हैं। जैकी बेबाकी से कहही है कि वेश्यावृति का उसके धंधे से ज्यादा आसान है, क्योंकि चिपक कर सोने में खुद को ज्यादा केंद्रित करना होता है।
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जहां आग में नहीं जलती मुर्दों की टांग!
सूरजबानी। गुजरात के कच्छ के रन में बनने वाला नमक देश की करीब 75 फीसदी नमक की जरूरत को पूरा करता है, लेकिन बहुत कम लोगों को इस कारोबार में लगे अगड़िया समुदाय के नमक मजदूरों की त्रासदी का भान है। ये मजदूर जिंदगी भर नमक बनाते हैं और अंत में मौत के बाद इन्हें नमक में ही दफन कर दिया जाता है। नमक मजदूरों के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि नमक में लगातार काम करने के कारण इनकी टांगे असामान्य रूप से पतली हो जाती हैं और इस कदर सख्त हो जाती हैं कि मौत के बाद चिता की आग भी उन्हें जला नहीं पाती। नमक के खेतों में काम करने वाले मजदूर बताते हैं कि इसलिए चिता की आग बुझने के बाद इनके परिजन इनकी टांगों को इकट्ठा करते हैं और अलग से नमक की बनाई गई कब्र में दफन करते हैं ताकि वे अपने आप गल जाएं। अहमदाबाद से 235 किलोमीटर और कच्छ जिला मुख्यालय से 150 किलोमीटर दूर स्थित सूरजबारी अरब सागर से मात्र दस किलोमीटर की दूरी पर है। गुजरात के पर्यटन अधिकारी मोहम्मद फारूक पठान ने बताया कि समुदाय के लोग यहां सदियों से रह रहे हैं और जीविका के रूप में उन्हें केवल यही काम आता है, नमक बनाना। यहां का भूजल समुद्री जल के मुकाबले दस गुना अधिक नमकीन है। इस भूजल को नलकूपों से निकाला जाता है और उसके बाद उस पानी को 25 गुना 25 मीटर के छोटे छोटे खेतों में भर दिया जाता है।’ उन्होंने बताया, ‘जब सूरज की किरणें इस पानी पर पड़ती हैं तो यह धीरे धीरे सफेद नमक में बदल जाता है ।’
गैर जाति के छूते ही झोपड़ी होती है अछूत
गैर जाति के छूते ही झोपड़ी होती है अछूत
अशोक दीक्षित
छत्तीसगढ़ के वनांचल में रहने वाले कमार भुंजिया जनजातियों की एक अनूठी परंपरा आज भी कायम है। इसमें वे अपने आवास के भीतर घास-फूंस से एक विशेष प्रकार की झोपड़ी बनाते है। इस झोपड़ी को वे लाल बंगला कहते हैं। इस बंगले को यदि कोई दूसरी जाति का व्यक्ति छू दे तो बंगले को वे आग के हवाले कर देते है, और नया लाल बंगला बनाते तक अन्न जल ग्रहण नहीं करते यह लाल बंगला उनकी इष्ट देवी और देवता का निवास होता है। जिसे कोई अन्य व्यक्ति नहीं छूने देते। क्षेत्र में कमारों के विकास के लिए कई योजनाएं चल रही है। इसके बावजूद कमार भुंजिया के भुंजिया के लोग विकास के लिए कई योजनाएं चल रही है इसके बावजूद कमार भुंजिया के लोग विकास की मुख्यधारा से नहीं जुड़े है। वे आज भी अपनी प्राचीन पंरपरा और मान्यताओं के साथ पिछड़ेपन की जिंदगी जीने को मजबूर है। गरियांबंद जिले के कटेपारा के तीजू भुंजिया (58) पिता फुलसिंग भुंजिया ने बताया कि वे लोग अपने आवास के भीतर एक अलग से छिंद, खद्दर, बांस और मिट्टी का छोटा घर बनाते है। कमारों की परंपरा को विस्तार से बताने वाले तीजू ने बताया कि लाल बंगला को जलाने के बाद छूने वाले व्यक्ति द्वारा लाल बंगला का निर्माण कराया जाता है। यदि वह तैयार नहीं होता तो वे स्वयं इसे तैयार करते हैं। जब तक बंगला दोबारा नहीं बन जाता तब तक उनके परिवार का खाना पीना बंद रहता है। वे लोग लाल बंगला में देवी देवताओं को बिठाते है। देवी और देवताओं का पूजा करते हैं। छूरा ब्लाक के कमार भुंजिया जनजातियों के लिए शासन द्वारा 25 हजार रुपए प्रति एकड़ की दर पर जमीन देने का प्रावधान है, लेकिन कमार भुंजिया लोगों को कृषि योग्य जमीन पर्दान नहीं की जा रही है। ब्लाक में इन जातियों के लिए किए जा रहे विकास के सारे दावे खोखले नजर आते हैं।
बेटियों की शादी के बाद लाल बंगले में प्रवेश निशेष : पूर्वजों की परंपरा के अनुसार कमारों की बेटियों को शादी के बाद लाल बंगले में प्रवेश निषेध है। शादी के बाद जब वह मायके आती है तब उसका विशेष ख्याल रखती है। किसी कमार भुंजिया की शादी ब्याह पर बेटी लाल बंगला में नहीं जाती वे इस परंपरा का निर्वाह जीवनभर करेंगे। साथ ही उनके आने वाली पीढ़ी भी इस परंपरा को निभाएगी। परिवार में किसी भी महिला के माहवारी आने पर बंगले को छु नहीं सकता। उस लाल बंगले के सामने अलग से अना हुआ मकान में गुजारा करते है। भुंजिया परिवार के लोग अपने निजी उपयोग में पीने अथवा उपयोग किए जाने पानी को नहर या नदियों या फिर कछार में छरिया बनाकर पानी निकालकर पानी उपयोग में लाते है।
जंगल से गांव की ओर : कमार भुंजिया जनजाति के लोग अपने आने वाली पीढ़ी को लेकर चिंतित हैं। वे जंगल से गांवों में जाकर बसते जा रहे हैं। वे अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर विकास की मुख्य धारा से जोड़ना चाहते हैं। हाट बजारों में किसी भी होटल या सार्वजनिक स्थानों में तेल से तली हुई वस्तुएं को सेवन नहीं करते है। स्वयं के द्वारा बनाएं ज्यादातर प्राय: बिना तेल के पसंद करते है। जंगली फलों को उपयोग में लाते हैं।
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अशोक दीक्षित
छत्तीसगढ़ के वनांचल में रहने वाले कमार भुंजिया जनजातियों की एक अनूठी परंपरा आज भी कायम है। इसमें वे अपने आवास के भीतर घास-फूंस से एक विशेष प्रकार की झोपड़ी बनाते है। इस झोपड़ी को वे लाल बंगला कहते हैं। इस बंगले को यदि कोई दूसरी जाति का व्यक्ति छू दे तो बंगले को वे आग के हवाले कर देते है, और नया लाल बंगला बनाते तक अन्न जल ग्रहण नहीं करते यह लाल बंगला उनकी इष्ट देवी और देवता का निवास होता है। जिसे कोई अन्य व्यक्ति नहीं छूने देते। क्षेत्र में कमारों के विकास के लिए कई योजनाएं चल रही है। इसके बावजूद कमार भुंजिया के भुंजिया के लोग विकास के लिए कई योजनाएं चल रही है इसके बावजूद कमार भुंजिया के लोग विकास की मुख्यधारा से नहीं जुड़े है। वे आज भी अपनी प्राचीन पंरपरा और मान्यताओं के साथ पिछड़ेपन की जिंदगी जीने को मजबूर है। गरियांबंद जिले के कटेपारा के तीजू भुंजिया (58) पिता फुलसिंग भुंजिया ने बताया कि वे लोग अपने आवास के भीतर एक अलग से छिंद, खद्दर, बांस और मिट्टी का छोटा घर बनाते है। कमारों की परंपरा को विस्तार से बताने वाले तीजू ने बताया कि लाल बंगला को जलाने के बाद छूने वाले व्यक्ति द्वारा लाल बंगला का निर्माण कराया जाता है। यदि वह तैयार नहीं होता तो वे स्वयं इसे तैयार करते हैं। जब तक बंगला दोबारा नहीं बन जाता तब तक उनके परिवार का खाना पीना बंद रहता है। वे लोग लाल बंगला में देवी देवताओं को बिठाते है। देवी और देवताओं का पूजा करते हैं। छूरा ब्लाक के कमार भुंजिया जनजातियों के लिए शासन द्वारा 25 हजार रुपए प्रति एकड़ की दर पर जमीन देने का प्रावधान है, लेकिन कमार भुंजिया लोगों को कृषि योग्य जमीन पर्दान नहीं की जा रही है। ब्लाक में इन जातियों के लिए किए जा रहे विकास के सारे दावे खोखले नजर आते हैं।
बेटियों की शादी के बाद लाल बंगले में प्रवेश निशेष : पूर्वजों की परंपरा के अनुसार कमारों की बेटियों को शादी के बाद लाल बंगले में प्रवेश निषेध है। शादी के बाद जब वह मायके आती है तब उसका विशेष ख्याल रखती है। किसी कमार भुंजिया की शादी ब्याह पर बेटी लाल बंगला में नहीं जाती वे इस परंपरा का निर्वाह जीवनभर करेंगे। साथ ही उनके आने वाली पीढ़ी भी इस परंपरा को निभाएगी। परिवार में किसी भी महिला के माहवारी आने पर बंगले को छु नहीं सकता। उस लाल बंगले के सामने अलग से अना हुआ मकान में गुजारा करते है। भुंजिया परिवार के लोग अपने निजी उपयोग में पीने अथवा उपयोग किए जाने पानी को नहर या नदियों या फिर कछार में छरिया बनाकर पानी निकालकर पानी उपयोग में लाते है।
जंगल से गांव की ओर : कमार भुंजिया जनजाति के लोग अपने आने वाली पीढ़ी को लेकर चिंतित हैं। वे जंगल से गांवों में जाकर बसते जा रहे हैं। वे अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर विकास की मुख्य धारा से जोड़ना चाहते हैं। हाट बजारों में किसी भी होटल या सार्वजनिक स्थानों में तेल से तली हुई वस्तुएं को सेवन नहीं करते है। स्वयं के द्वारा बनाएं ज्यादातर प्राय: बिना तेल के पसंद करते है। जंगली फलों को उपयोग में लाते हैं।
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10 रुपए के स्टांप पेपर पर बेटी का सौदा
जुर्माना भरना था तो 11 साल की बेटी बेच दी
नारायण बारेठ/जयपुर bbc
अभी वो सावन के झूलों, मंदिर की घंटियों और सहेलियों के संग खेलने-कूदने की उमंग से सराबोर थी। लेकिन उसे मां ने ही पराये हाथों बेच दिया। मां और खरीदार में बेटी के लिए ऐसे सौदा हुआ जैसे कोई जमीन-जायदाद या गांव में मवेशी के लिए खरीद-फ़ररोख्त हो रही हो। बोली लगी और मां ने अपनी 11 साल की बेटी को बेच दिया। राजस्थान के टोंक में पुलिस ने मां, खरीदार और बिचौलिये को गिरफ्तार कर लिया है। सौदा दस रुपये के स्टाम्प कागज पर हुआ और भुगतान किस्तों में तय हुआ था। पुलिस के मुताबिक इसका भांडा तब फूटा जब बालिका ने इस सौदे का विरोध किया और बचने के लिए बस्ती से निकल भागी। बालिका का पीछा किया गया तो वो बचने के लिए एक होटल में घुस गई और फर्नीचर के पीछे छुप गई। इसे देख लोगों ने पुलिस को इत्तिला दी और इस खरीद-फरोख्त सामने आ गई।
पुलिस के मुताबिक, बालिका की मां झालावाड़ की रहने वाली है। बालिका के खरीदार के साथ मां को गिरफ्तार कर लिया गया है। टोंक के पुलिस मानव तस्करी विरोधी यूनिट के उप निरीक्षक राकेश वर्मा ने कहा कि न लोगों को अदालत में पेश किया गया है। अब ये 8 फरवरी तक पुलिस रिमांड पर हैं। हम घटना की तह में जाने की कोशिश कर रहे है। वहीं लड़की की मां ने पुलिस को बताया कि पंचायत ने उस पर साढ़े चार लाख रुपये का जुर्माना लगाया था जिसके बाद उसने बेटी की बिक्री की क्योंकि उसे जुर्माने के लिए पैसे की जरूरत थी। महिला ने पुलिस को बताया कि उसने अपनी बेटी को सवाई माधोपुर में एक व्यक्ति के यहां 'नाते' बैठा दिया था। नाता राजस्थान में शादी की एक प्रथा है इसमें पुरुष महिला के बदले कुछ पैसा देकर शादी कर लेता है। मां अपनी बेटी को कुछ समय बाद ही सवाई माधोपुर से वापस घर ले आई। पंचायत ने इसे गलत माना और अर्थ दंड लगा दिया। इस हिसाब से लड़की दूसरी बार बिकी है। बेटी के लिए ऐसे सौदा हुआ मानो मवेशी के लिए खरीद-फ़रोख्त हो रही हो।
पुलिस को मिले दस्तावेज के मुताबिक सौदा साढ़े छह लाख में तय हुआ जिसकी पहली किश्त दो लाख रुपए 16 दिसंबर को दी गई। पुलिस को बालिका ने बताया कि मां का कलेजा नहीं पसीजा और उसे ख़रीदार को सौंप दिया गया। वे उसे कंजरी बस्ती ले आये और अनैतिक कार्य के लिए दबाव डालने लगे। उसके साथ मारपीट भी की गई। बालिका ने पुलिस को बताया कि उसे मुंबई में बेचने के बात की जा रही थी तभी वो भाग निकली। पुलिस के अनुसार बालिका सवारी ढोने वाली एक जीप में बैठ गई और किराया मांगा तो रोने लगी। तभी दोनों ख़रीदार उसे पकड़ने के लिए आ गए. उनसे बचने के लिए वो सड़क किनारे एक होटल में दाखिल हो गई। फिलहाल लड़की को बालिका-गृह में रखा गया है।
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