Monday, 6 June 2016
Thursday, 3 July 2014
तस्करी की मंडी में मासूम
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-देश के औसतन हर घंटे में एक बच्चा गायब होता है
-राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 44,000 बच्चे हर साल लापता हो जाते हैं
- लापता बच्चों में करीब 11,000 का ही पता लग पाता है
यूएन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत मानव तस्करी का बड़ा बाजार बन चुका है
-देश की राजधानी दिल्ली मानव तस्करों की पसंदीदा जगह बनती जा रही है
- देश भर से बच्चों और महिलाओं को लाकर ना केवल आसपास के इलाकों बल्कि विदेशों में भी भेजा जा रहा है
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हर राज्य के अखबारों में बच्चों के गायब होने की खबर किसी ने किसी पन्ने के कोने में झांकती रहती है। देश बड़ा है। आबादी बड़ी है। संभव हो आपके आसपास कोई ऐसा नहीं मिले, जिसके बच्चे होश संभालने से पहले ही गायब हो चुके हो। इसलिए आपको जानकार थोड़ा आश्चर्य होगा, लेकिन हकीकत यह है कि आज देशभर में करीब .आठ सौ गैंग सक्रिय होकर छोटे-छोटे बच्चों को गायब कर मानव तस्करी के धंधे में लगे हैं। यह रिकार्ड सीबीआई का है।
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संजय स्वदेश
बीते दिनों केरल पुलिस के 16 अधिकारियों ने झारखंड के 123 बच्चों को केरल से जसीडीह स्टेशन पहुंचाया गया। ए बच्चे मानव तस्करी के जरिए केरल के अनाथालय में पहुंचाया गया था। पिछले वर्ष भी इसी तरह थोक में बच्चों की मानव तस्करी की एक और मामले का पदार्फाश हुआ था। राजस्थान के भरतपुर रेलवे स्टेशन से 184 बाल मजदूरों को मुक्त करा कर पटना पहुंचाया गया। आए दिन देश के हर राज्य के अखबारों में बच्चों के गायब होने की खबर किसी ने किसी पन्ने के कोने में झांकती रहती हंै। देश बड़ा है। आबादी बड़ी है। संभव हो आपके आसपास कोई ऐसा नहीं मिले, जिसके बच्चे होश संभालने से पहले ही गायब हो चुके हो। इसलिए आपको जानकार थोड़ा आश्चर्य होगा, लेकिन हकीकत यह है कि आज देशभर में करीब आठ सौ गैंग सक्रिय होकर छोटे-छोटे बच्चों को गायब कर मानव तस्करी के धंधे में लगे हैं। यह रिकार्ड सीबीआई का है। मां-बाप का जिगर का जो टुकड़ा दु:खों की हर छांव से बचता रहता है, वह इस गैंग में चंगुल में आने के बाद एक ऐसी दुनिया में गुम हो जाता है, जहां से न बाप का लाड़ रहता है और मां के ममता का आंचल। किसी के अंग को निकाल कर दूसरे में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है, तो किसी को देह के धंधे में झोंक दिया जाता है, तो हजारों मजदूरी की भेंट चढ़ जाते हैं। पीड़ित में ज्यादातर दलित समाज से संबंद्ध हैं।
गुमशुदा होने के समान्य आंकड़ों के अनुसार देश के औसतन हर घंटे में एक बच्चा गायब होता है। मतलब देशभर में चौबीस घंटे में कुल 24 लोगों के जिगर के टुकड़ों को छिन कर जिंदगी के अंधेरे में ढकेल दिया जाता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 44,000 बच्चे हर साल लापता हो जाते हैं और उनमें से करीब 11,000 का ही पता लग पाता है। भारत में मानव तस्करी को लेकर यूएन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत मानव तस्करी का बड़ा बाजार बन चुका है और देश की राजधानी दिल्ली मानव तस्करों की पसंदीदा जगह बनती जा रही है, जहां देश भर से बच्चों और महिलाओं को लाकर ना केवल आसपास के इलाकों बल्कि विदेशों में भी भेजा जा रहा है। वर्ष 2009 से 2011 के बीच लगभग 1,77,660 बच्चे लापता हुए जिनमें से 1,22,190 बच्चों को पता चल सका, जबकि अभी भी 55 हजार से ज्यादा बच्चे लापता हैं जिसमें से 64 फीसदी यानी लगभग 35,615 नाबालिग लड़कियां हैं। वहीं इस बीच करीब 1 लाख 60 हजार महिलाएं लापता हुईं जिनमें से सिर्फ 1 लाख 3 हजार महिलाओं का ही पता चल सका। वहीं लगभग 56 हजार महिलाएं अब तक लापता हैं। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2011-12 में एनजीओ की मदद से 1532 बच्चों को बचाया जा सका। वर्ष 2009-2011 के बीच लापता हुए लगभग 3,094 बच्चों का अबतक कोई सुराग नहीं लग पाया है जिनमें से 1,636 लड़कियां हैं तो वहीं इस दौरान गायब हुईं लगभग 3,786 महिलाएं भी अबतक लापता हैं।
गायब बच्चों के माता-पिता के आंखों के आंसू सूख चुके हैं। पर उनकी यादें हर दिन टिस मारती है। ऐसी बात नहीं है कि इन तरह के अपराधों के रोकथाम के लिए कानून नहीं है। कानून तो है, पर इसका क्रियान्वयन ठीक से नहीं हो पा रहा है। यदि क्रियान्वयन भी होता है तो इसमें इतनी खामियां हैं कि मानव तस्करों के गिरोह पर मजबूती से नकेल नहीं कसा जा पता है। कई मामलों में तो देखा गया है कि ऐसे कानूनों की जानकारी थाने में तैनात पुलिसवालों को भी नहीं होती है। हालांकि गृहमंत्रालय की विभिन्न इकायों के माध्यम से करीब 225 मानव तस्कर विरोधी इकाइयां सक्रिय हैं। गृह मंत्रालय की मानव तस्करी विरोधी इकाइयों 2011 से अब तक देश भर में 4000 से अधिक बचाव अभियान चलाए और 13742 पीड़ितों को बचाया। साथ ही 7087 मानव तस्करों को गिरफ्तार कराया। जल्द ही 100 और नई ऐसी इकाइयां गठित होने वाली है। लेकिन सरकार की मानव तस्कर विरोधी गतिविधियां जिस गति से सक्रिय है, उससे कई ज्यादा तेज तस्करों का गिरोह हैं। देश और देश के बाहर दूर दराज के गरीब ग्रामीणों व आदिवासी क्षेत्र के बच्चे इसी तरह मानव तस्करी की आग में जलते जा रहे हैं। भारत ने मानव तस्करी रोकने के लिए कई अंतरराष्ट्रीय संधियों को मंजूरी दी है। इनमें संयुक्त राष्ट्र ट्रांसनेशनल संगठित अपराध संधि और महिलाओं और बच्चों की तस्करी से जुडी दक्षेस संधि जैसे समझौते शामिल हैं। इसके अलावा बांग्लादेश के साथ द्विपक्षीय समझौता है। इसके बावजूद बांग्लादेश और नेपाल से लगी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर मानव तस्करी जोरों पर होती है। बांग्लादेश और नेपाल से सीमा पार मानव तस्करी में संगठित गिरोह शामिल हैं, लेकिन सफल जांच और मुकदमे के शायद ही ऐसे कोई मामले हों, जो अपराधियों के मन में भय पैदा करते हों। कई बार यह देखा गया है कि मानव तस्करी से निपटने के लिए सीमा रक्षक बलों, राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसे आयोगों तथा राज्य की कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच त्वरित समन्वय और सक्रियता की भी भारी कमी है। जब तक तस्कर पीड़ित मासूमों को अपने परिवार का सदस्य समय कर मानव तस्करों के खिलाफ कार्य करने वाली सरकारी एजेंसियां सक्रिय होकर कार्य नहीं करेंगी, देश में इस काले अमावीय धंधे का थोक बाजार फलता फूलता रहेगा।
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झारखण्ड : नाबालिग आदिवासी आसान शिकार
रांची। झारखण्ड घरेलू नौकरों की सप्लाई और मानव तस्करी का एक अड्डा बन गया है। यहां गरीब आदिवासियों को घरेलू नौकर बनाने के नाम पर एक बड़ा धंधा पिछले कई दशक से निर्वाध रूप से चल रहा है। चल ही नहीं बड़े जोरों से फल फूल भी रहा है। नाबालिक गरीब आदिवासी लड़कियां इसके आसान शिकार बनाई जा रही हैं। काम दिलाने के नाम पर इन्हें राज्य और देश कि सीमाओं से बाहर के नगरों-महानगरों तक ले जाया जाता है, जहां ये अमानवीय स्थितियों में काम करने और जीने को अभिशप्त होती हैं, जिन घरों में ये काम के नाम पर कैद कर दी जाती हैं वहां उनके मालिक अमूमन इनके साथ कैसा बर्ताव करते हैं, यह आए दिन अखबारों में पढ़ने को मिलाता रहता है। करीब 6 हजार आदिवासी लड़कियों के लापता होने की सूचना पुलिस रिकार्ड में है। वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा होगी। आश्चर्य तो यह है कि इस समस्या से उबरने के लिए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने कई गैर सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) को प्रति व्यक्ति 19,400 रुपए के हिसाब से पैसों का भुगतान किया। उन्होंने इसे कंट्रोल करने के नाम पर उल्टे घरेलू नौकर बनाने का ही काम किया, वो भी सरकारी पैसे से। इन संस्थाओं ने राज्य और केंद्र को गलत रिपोर्टे सौंपी। फर्जी प्रशिक्षणार्थियों के नाम लिखकर पैसे निकाले। कई संस्थाओं ने तो प्रशिक्षण दिया किसी और को, नौकरी का रहा है कोई और, नौकरी भी कैसी-घरेलू नौकर की। हद तो यह है कि ये संस्थाएं आगे भी प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने की इजाजत मांग रहीं हैं। एक खबर के अनुसार इन संस्थाओं को अब तक 300 करोड़ से भी अधिक की राशि का भुगतान किया जा चुका है। इसमें किसी सरकारी कर्मचारी और अफसरों ने कोई घूस नहीं खाई होगी, ऐसा मानने का दिल नहीं करता। देश की राजघानी दिल्ली समेत कई नगरों-महानगरों के अखबारों में तो बाजाब्ता विज्ञापन छपता है कि अगर आपको आदिवासी नौकरानी चाहिए तो संपर्क करें। नीचे पता और फोन नंबर भी होते हैं। कहने का अर्थ यह कि ये सब खुलेआम चल रहा है और कानून के लंबे हाथ यहाँ तक केवल चंदा वसूलने के लिए पहुंचते हैं।
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मध्यप्रदेश /हजारों नाबालिगों का सुराग नहीं
मध्य प्रदेश में पिछले 5 सालों 4990 नाबालिग लड़कियां लापता हुई हैं, जिनका अभी तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है। बालिका जन्म को प्रोत्साहित करने के लिए चल रहे बेटी बचाओ अभियान पर नाबालिग लड़कियों के लापता होने की घटनाओं ने सवाल खड़े कर दिए हैं। यह खुलासा एक बार विधानसभा में सरकार की ओर से दिए गए जवाब में हुआ। कांग्रेस विधायक रामनिवास रावत ने विधानसभा में मानव तस्करी का मसला उठाया। उनका आरोप था कि राज्य में लड़कियों की मानव तस्करी के मामलों में 2008 से 2013 के बीच कई मामले सामने आए हैं। वहीं रावत के आरोपों को नकारते हुए गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता ने बताया कि पांच सालों में लड़कियों की मानव तस्करी के 178 मामले ही सामने आए हैं। इनमें 40 वयस्क और 138 नाबालिग लड़कियों से जुड़े मामले हैं। एमपी में पांच साल में लापता हो गईं पांच हजार लड़कियां। उमाशंकर गुप्ता के जवाब पर सवाल उठाते हुए रावत ने कहा कि पांच साल में लापता हुई नाबालिग लड़कियों में से 4990 का अब तक पता नहीं चल पाया है, लिहाजा यह भी मानव तस्करी से जुड़े मामले हैं। कांग्रेस के अन्य विधायकों ने भी इस बात का समर्थन किया। उमाशंकर गुप्ता ने बताया कि पांच सालों में 29,828 नाबालिग लड़कियां लापता हुई थी, इनमें से 4990 अब भी लापता की श्रेणी में है। कई बार गुम हुई लड़कियां घर वापस आ जाती हैं, मगर उनके परिजन पुलिस को सूचित नहीं करते हैं। लापता लड़कियों का सही ब्यौरा तैयार करने के लिए पुलिस द्वारा विशेष अभियान चलाया जाएगा। गुप्ता ने नाबालिग लड़कियों के लापता होने को मानव तस्करी मानने से ही इंकार कर दिया। गृहमंत्री के जवाब पर कांग्रेस विधायकों ने नाराजगी जताई और कहा कि सरकार एक तरफ बेटी बचाओ अभियान चला कर इस पर करोड़ों रुपए खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर बेटियां लापता हो रही हैं। और सरकार उन्हें खोज नहीं पा रही है। सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए असंतुष्ट कांग्रेस विधायक सदन से बाहर निकल गए।
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छत्तीसगढ़ / सुनहरे सपनों के दलाल सक्रिय
जशपुर। छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले की 97 ग्राम पंचायतों के 258 गांवों की लगभग 3180 लड़कियां घर से लापता हैं। आशंका है कि इन्हें दलालों द्वारा बेच दिया गया है। दरअसल, छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाकों में मानव तस्करी का व्यवसाय अनवरत जारी है। स्वयंसेवी संगठनों की आवाज भी मानव तस्करी को रोक पाने में असफल है। परिणाम यह है कि मासूम, भोली-भाली आदिवासी बालाओं की खरीद-बिक्री छत्तीसगढ़ के आदिवासी जिलों में बेरोकटोक जारी है। शासन-प्रशासन इस ओर ध्यान देने के लिए तैयार नहीं है। इस मामले को लेकर कई बार विधानसभा में भी सरकार से प्रश्न पूछे जा चुके हैं, लेकिन सरकार हमेशा इस पर गोलमोल जवाब देकर टाल देती है।
छत्तीसगढ़, झारखंड और उड़ीसा आदि राज्यों के सीमावर्ती गांवों की आदिवासी बालाओं को प्लेसमेंट एजेंसी के नाम पर दलाल सुनहरे भविष्य का सपना दिखाते हैं और उन्हें बड़े शहरों में ले जाकर बेच देते हैं। मानव व्यापार के मुद्दे ने 2007 में भी जोर पकड़ा था, जब मिशनरियों द्वारा संचालित कुनकुरी की स्वयंसेवी संस्था ने अपने सर्वेक्षण में 3718 युवतियों के गायब होने का खुलासा किया था। संस्था ने बताया था कि इन युवतियों को दिल्ली एवं अन्य महानगरों में बेचा गया। आदिवासी क्षेत्रों में लड़कियों को उठाने वाले दलालों के गिरोह भी सक्रिय हैं। वर्ष 2007 में तत्कालीन भाजपा विधायक राजलिन बेकमेन एवं राकपा के नोबेल वर्मा ने इस मामले को विधानसभा में भी उठाया था। पिछले साल का आई एक रिपोर्ट के अनुसार जशपुर जिले के विभिन्न थानों में 42 लड़कियों के गायब होने की रिपोर्ट दर्ज की गई है, जिनमें 36 मामलों पर पुलिस कार्रवाई कर रही है और 8 मामलों में विवेचना पूरी होने वाली है। आईपीएस एस सी द्विवेदी का मानना है कि लड़कियों के गायब होने के मामले काफी गंभीर होते हैं। इसलिए, किसी भी व्यक्ति या संस्थान के आंकड़ों और बयानों पर कुछ कहना उचित नहीं होगा। वे जिले से हजारों लड़कियों के गायब होने की खबर को वह तथ्यहीन बताते हैं। दूसरी ओर, समाजसेवी संगठनों का आरोप है कि ऐसे मामलों में पुलिस रिपोर्ट दर्ज करने से आनाकानी करती है. वैसे भी, दूरदराज के क्षेत्रों से पुलिस थाने तक पहुंच पाना आदिवासियों के वश की बात नहीं है।
प्लेसमेंट एजेंसी के नाम पर अशिक्षित या अर्धशिक्षित आदिवासी युवतियों को घरों में काम दिलाने के बहाने शहरों में पहुंचा देना कोई मुश्किल काम नहीं है। रोजगार की तलाश में ये युवतियां बड़े शहरों में पहुंचने के बाद असामाजिक तत्वों के चंगुल में फंस जाती हैं। दलालों के चंगुल से मुक्त होकर वापस आईं आदिवासी युवतियों में एड्स के लक्षण पाए गए। सामाजिक कार्यकतार्ओं के अनुसार, आदिवासी क्षेत्रों में मानव तस्करी निरंतर जारी है। लोदाम चौकी के अंतर्गत रहने वाली प्रभावती एवं झारखंड की खुरी निवासी मंजू बताती हैं कि उन्हें एक साल पहले एक महिला दलाल के माध्यम से प्लेसमेंट एजेंसी के हाथों बेचा गया था। दिल्ली के विकासपुरी इलाके में रहने वाले एक अग्रवाल परिवार के यहां इन्हें एक तरह से बंधक बनाकर रखा गया था। दोनों वहां आने-जाने वाले लोगों के कपड़े धोने और खाना बनाने का काम करती थीं। कुछ दिन तक सब कुछ सामान्य रहा। इस बीच अग्रवाल रोज देर रात घर आता और इन पर अत्याचार करता था। वेतन का एक भी पैसा इनके हाथ नहीं लगता था। लड़कियों ने बताया कि उनका वेतन दलाल ले जाता था। घर आने-जाने वाले मेहमान यदि खुश होते तो 10-20 रुपए टिप के रूप में दे देते थे। उन्हीं पैसों के सहारे दोनों लड़कियां किसी तरह अग्रवाल के चंगुल से भागने में सफल हुईं। इनमें से एक युवती को अपने गांव का पता तक नहीं मालूम है। हद तो तब हो गई, जब दोनों लड़कियां शिकायत दर्ज कराने लोदाम चौकी पहुंची। वहां मौजूद पुलिस अधिकारियों ने उनकी फरियाद सुनने तक से इंकार कर दिया था। चाईवासा जिले की चिड़िया गांव निवासी 23 वर्षीय गुरुवारी के पिता पंटू कोल ने बताया कि गांव के शिवलाल ने उसे लगभग दो वर्ष पूर्व दिल्ली में बेच दिया था। उसके साथ वहां दो लड़कियां और भी रहती थीं, जिन्हें संतोष नामक व्यक्ति ने खरीदा था। वहां उनके साथ वह अत्याचार करता था. अत्याचार करने से पहले उन्हें जबरन शराब पिलाई जाती थी। मना करने पर उन्हें बेरहमी से पीटा जाता था। एक दिन सामूहिक अत्याचार के प्रयास से पहले ही गुरुवारी माजरा समझ गई। जब उसने भागने की कोशिश की तो कुछ लोगों ने उसे जबरन शराब पिलाना शुरू कर दिया। यह देख उसने छत से छलांग लगा दी, जिससे उसके दोनों पैरों की हड्डियां टूट गईं। आनन-फानन में दलाल ने उसे ट्रेन पर बिठा दिया। शराब के नशे में धुत्त युवती किसी तरह रायगढ़ पहुंची, जहां एक समाजसेवी ने उसे जिला चिकित्सालय में दाखिल कराया। युवती की दशा देखते हुए भी जिला चिकित्सालय के डॉक्टरों ने उसे डिस्चार्ज कर दिया था।
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विश्व में ढाई करोड़ लोग चढ़े मानव तस्करी की भेंट
मानव तस्करी जैसा जघन्य अपराध हमारे देश में बड़े पैमाने पर जारी है। देश में ऐसे दानव तुल्य लोग भी हैं, जो मानव को बेचने और खरीदने का गोरखधंधा करते हैं और यह सारा कुछ समाज के बड़े-बड़े ठेकेदारों और बड़े-बड़े कर्णधारों की नाक तले होता आया है। हथियारों और मादक पदार्थों की तस्करी के बाद मानव तस्करी विश्व का सबसे अधिक लाभदायक गैर कानूनी व्यापार है।
राजेंद्र राठौर
मानव की खरीद-बिक्री कोई ऐसा कारोबार नहीं है, जिसे आसानी से चलने दिया जाए और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी उठाने वाले लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें। यह काला कारोबार मानवीयता, सभ्यता और कानून-व्यवस्था के साथ-साथ हमारे धर्मो को भी चुनौती देता है। वर्तमान समय में विश्व के बहुत से देशों को जिन चुनौतियों का सामना है उनमें से एक, मानव तस्करी की समस्या है। विश्व स्तर पर प्रकाशित होने वाले कुछ आंकड़ों से पता चलता है कि पूरे विश्व में ढाई करोड़ से अधिक लोग, मानव तस्करी की भेंट चढ़े हैं और मानव तस्करी में लिप्त लोगों ने इस अमानवीय व गैर कानूनी व्यापार से अरबों डालर कमाए हैं। मानव तस्करी का शिकार होने वाले लोग महिलाओं, बच्चों बल्कि पुरुषों सहित समाज के सभी वर्गों से संबंध रखते हैं। बच्चों को भीख और चोरी जैसे विभिन्न उद्देश्यों के लिए तथा महिलाओं को यौन व्यापार तथा घरों में काम करने और पुरुषों को उद्योगिक केन्द्रों तथा अत्याधिक कठिन व हानिकारक कामों के लिए मानव तस्करी का शिकार बनाया जाता है। मानव तस्करी का सबसे अधिक स्पष्ट व पीड़ादायक पहलू यह है कि अधिकांश मामलों में लोग स्वेच्छा से इसके लिए तैयार हो जाते हैं और उन्हें उसके परिणामों के बारे में सही जानकारी नहीं होती। यूरोपीय और पश्चिमी देशों के लिए अधिकांश मानव तस्कर, मनुष्यों का शिकार करते हैं। इस कारोबार से जुड़े लोगों के संबंध कई राजनेताओं से होते हैं, इस वजह से यह कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है। युरोपीय आयोग की जांच से पता चलता है कि विभिन्न गैर सरकारी संस्थाओं, न्यायपालिका के विभागों, पलायनकतार्ओं से संबंधित संगठनों तथा कई सरकारी, क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय संगठनों व संस्थाओं की गतिविधियों के बावजूद मानव तस्करी के संदर्भ में अभी तक विश्वस्त आंकड़ें प्राप्त नहीं हो सके हैं। मानव तस्करी का शिकार होने वालों की सही संख्या का पता लगाना असंभव है, क्योंकि यह पूरी प्रक्रिया गुप्त रूप से की जाती है। इस संदर्भ में तैयार की जाने वाली बहुत सी अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टों में मानव तस्करी की बढ़Þती घटनाओं के बारे में सही आंकड़े मौजूद न होने पर बल दिया गया है, किंतु, प्रत्एक दशा में संयुक्त राष्ट्रसंघ की रिपोर्ट के अनुसार मानव तस्करी पर अंकुश लगाने के लिए विश्व समुदाय के भरसक प्रयासों के बावजूद, हर वर्ष लगभग 40 लाख लोग मानव तस्करी की भेंट चढ़ते हैं। इनमें अधिकांश महिलाएं और बच्चे होते हैं। हर वर्ष मानव तस्करी का शिकार होने वाले बच्चों और महिलाओं की संख्या 25 लाख से अधिक है। मानव तस्करी पूर्वी व केन्द्रीय यूरोप, आफ्रीका, एशिया तथा दक्षिणी अमरीका से बेल्जियम, जर्मनी, इटली, थाईलैंड, तुर्की, अमरीका जैसे देशों तथा इस्राईल के लिए की जाती है। ब्रिटेन के मानव तस्करी निरोधक विभाग ने वर्ष 2011 में अपनी रिपोर्ट में घोषणा की थी कि मानव तस्करी का शिकार होकर ब्रिटेन पहुंचने वाले लोगों में से 11 प्रतिशत को घरों में काम पर लगाया गया, वहीं 1 प्रतिशत लोगों के अंगों की तस्करी की गई, जबकि 17 प्रतिशत लोगों को अपराधिक गतिविधियों में ढकेला गया और 22 प्रतिशत लोगों से बेगार कराया गया। इसके अलावा 31 प्रतिशत लोगों का यौन शोषण किया गया और 18 प्रतिशत लोगों की तस्करी के कारणों का पता नहीं चल पाया।
28 अरब डॉलर का सलाना धंधा
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं और बच्चों के यौन शोषण से की जाने वाली कमाई ही लगभग 28 अरब डालर प्रति वर्ष है। यूरोपीय संघ के आकंड़ों के अनुसार मानव तस्करी का शिकार होने वाला हर बच्चा, तस्करी करने वाले गुट के लिए 2 लाख डालर से अधिक आमदनी का साधन होता है। यूरोप के वे देश जहां के लिए मानव तस्करी बढ़Þ रही है, उनमें ब्रिटेन भी है। कनाडा भी उन देशों में शामिल है, जहां मानव तस्करी के माफिया सक्रिय हैं। अमरीका में बहुत से लोगों को यौन दासता के लिए खरीदा व बेचा जाता है।
दंड का डर नहीं
विभिन्न देशों में मानव तस्करी के विरुद्ध सक्रिय संगठनों और कार्यकर्ताओं का मानना है कि विश्व में इस अमानवीय व गैर कानूनी व्यापार के विस्तार का एक कारण इस समस्या के निवारण के लिए सरकारों द्वारा आवश्यक कदम नहीं उठाया जाना है। अमरीका में प्रकाशित होने वाले आकंड़ों से पता चलता है कि इस देश में मानव तस्करी का शिकार होने वाले हर 800 लोगों के लिए केवल एक तस्कर को न्यायालय में दंडित किया जाता है और उसे मिलने वाला दंड भी बहुत साधारण होता है, इसीलिए दंड पाने वाले तस्कर जेल से निकलने के बाद पुन: इसी काम में व्यस्त हो जाते हैं।
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Monday, 16 September 2013
जन को जगाओ, बच्चों को बचाओ
भारत में केंद्र और राज्य सरकार के ढेरों ऐसी योजनाएं हैं जिसके माध्यम से सरकारी अमला बच्चों के बेहतर भविष्य का दावा करता हैं, लेकिन हालात यह है कि ऐसी योजनाएं लाखों मासूम तक पहुंचने से पहले भ्रष्टाचार का ग्रास बन जाती है। ये भ्रष्टाचारी कभी यह नहीं सोचते हैं कि जिनके हिस्से की राशि वे भ्रष्टाचार के रूप में लेकर कर अपने घर-परिवार में बच्चों को ऐसो आराम उपलब्ध करा रहे हैं, दरअसल उसकी कीमत किसी दूसरे के गोद के मासूम के मुंह में जाने वाला निवाला है, स्वास्थ्य सुविधाओं समेत अन्य दूसरी योजनाओं के रूप में उनकी जिंदगी है।
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संजय स्वदेश
संयुक्त राष्ट्र ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि उसके प्रयासों से पिछले दो दशक में दुनिया भर के करीब नौ लाख बच्चों की जिंदगियां बचाई जा सकी हैं लेकिन 2015 तक इस मृत्यु दर में दो तिहाई की कमी का लक्ष्य फिलहाल पूरा होता नहीं दिखता। रिपोर्ट खुलासा करती है कि 1990 में जहां विभिन्न कारणों से दुनिया भर में पांच साल तक की आयु के एक करोड़ 26 लाख बच्चे असमय काल के ग्रास बन गए। वहीं 2012 में यह आंकड़ा 66 लाख पर ही रुक गया।
रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में पांच साल से कम उम्र के आधे से अधिक बच्चों की मौत अकेले भारत, चीन, कांगो, पाकिस्तान और नाइजीरिया में होती है। बच्चों की इस असामयिक मौत के लिए निमोनिया, मलेरिया और दस्त के साथ कुपोषण को बड़ी वजह बताया गया है। इस अभियान का सबसे सुखद, सराहनीय और उल्लेखनीय पहलू यह है कि बांग्लादेश, इथोपिया, नेपाल, लाइबेरिया, मलावी और तंजानिया जैसे गरीब देश भरसक कोशिश करते हुए 1990 के बाद से अब तक अपने यहां बाल मृत्यु दर में दो तिहाई या उससे अधिक की कमी का लक्ष्य हासिल कर प्रेरक बन गए हैं। ए गरीब देश भारत जैसे विकासोन्मुख देशों के लिए बड़ी प्रेरणा कहे जा सकते हैं जहां दिन-ब-दिन बढ़Þती जनसंख्या के साथ बाल मृत्यु दर सबसे भयावह समस्या बनी हुई है। यूनिसेफ की 2012 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2011 में वैश्विक स्तर पर इस आयु वर्ग के प्रतिदिन मरने वाले 19000 बच्चों में से करीब चौथाई भारत में मृत्यु का ग्रास बने। यानी हर दिन करीब चार हजार बच्चे मौत के मुंह में समा गए। बाल विकास के नाम पर तमाम सरकारी और गैर-सरकारी योजनाओं की मौजूदगी के बावजूद अपने यहां दुनिया के बाकी देशों की तुलना में सबसे ज्यादा मौतें होना बहुत त्रासद और विचारणीय है। अपने यहां बच्चों की असामयिक मौत के पीछे गरीबी, कुपोषण और अशिक्षा सबसे बड़े कारण माने जाते हैं और इसके लिए अंतत: हमारा शासन तंत्र जिम्मेदार है।
भारत में केंद्र और राज्य सरकार के ढेरों ऐसी योजनाएं हैं जिसके माध्यम से सरकारी अमला बच्चों के बेहतर भविष्य का दावा करता हैं, लेकिन हालात यह है कि ऐसी योजनाएं लाखों मासूम तक पहुंचने से पहले भ्रष्टाचार का ग्रास बन जाती है। ये भ्रष्टाचारी कभी यह नहीं सोचते हैं कि जिनके हिस्से की राशि वे भ्रष्टाचार के रूप में लेकर कर अपने घर-परिवार में बच्चों को ऐसो आराम उपलब्ध करा रहे हैं, दरअसल उसकी कीमत किसी दूसरे के गोद के मासूम के मुंह में जाने वाला निवाला है, स्वास्थ्य सुविधाओं समेत अन्य दूसरी योजनाओं के रूप में उनकी जिंदगी है।
मासूम बच्चों के लालन-पालन, स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए अनुकूल माहौल बनाने की जिम्मेदारी केवल केंद्र सरकार पर नहीं हैं। केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकार के कंधे पर भी यही बोझ है। आज के मासूम बच्चे ही कल के जिम्मेदार नागरिक हैंÑ, जैसा वे वातावरण पाकर बड़े होंगे वैसा ही आने वाले भारत का भविष्य होगा। आज देश में छोटे-बड़े क्षेत्रों में कई क्रूर इंसान मिल जाएंगे। वे असामाजिक तत्वों के दायरे में आएंगे। दरअसल ऐसी प्रवृत्ति उनके बचपन में मिले वातावरण के कारण ही विकसित हुए। समाज की भी ऐसी जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने बीच के भूखे-नंगे और किसी बीमारी से पीड़ित बच्चों की सुध ले। भविष्य संवारने की जिम्मेदारी केवल सरकार और एक परिवार विशेष की नहीं होती है। समाज को इस दिशा के सोचना बेहद जरूरी है कि आज के नौनिहालों के मन में यदि नकारात्मक प्रवृत्ति घर करती है और वे बड़े होकर असामाजिक तत्वों हो जाते हैं। फिर वे उसी समाज को दर्द देंगे। समाजिक-सरकारी उपेक्षा से में पल कर तैयार होने वाले नागरिक इस बात की गारंटी नहीं दिलाते हैं कि वे अपने बचपन में समाजिक और सरकारी उपेक्षा के बदले समाज और देश के साथ कुछ अच्छा करेंगे। राष्टÑीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चलाई जाने वाली योजनाओं की सफलता की रफ्तार बहुत धीमे हैं। क्योंकि इन योजनाओं में समाज का उचित सहयोग नहीं मिल पता है। समाज में माहौल तैयार करने की प्रक्रिया एक वाहन के दो पहिए की तरह है। एक पहिया योजनाओं के क्रियान्वयन करने वाले एजेंसियों हैं तो दूसरा समाज। यह सामूहिक जिम्मेदारी है।
Sunday, 8 September 2013
Tuesday, 13 August 2013
डेढ़ गुनी ज्यादा सैलरी पर राहुल के ‘वॉर रूम’ से जुड़ रहे हैं पत्रकार
त्रिदीब रमण
सीनियर पत्रकारों में राहुल गांधी के ‘वॉर रूम’ ज्वाइन करने की होड़ मची है। हालिया दिनों में कम से कम डेढ़ दर्जन पत्रकार जिनमें से अधिकांश भाजपा बीट कवर कर रहे थे, उन्होंने अपनी जमी-जमायी अखबार की नौकरी को लात मार कर कोई डेढ़ गुनी बढ़ी हुई तनख्खाह पर राहुल का साथ ज्वाइन कर लिया है। राहुल और उनकी टीम ने भाजपा बीट कवर रहे पत्रकारों को महज इसीलिए प्रमुखता दी है कि इनका मानना है कि ये पत्रकार भाजपा व संघ की अंदरूनी राजनीति और उनकी चुनावी रणनीतियों को बखूबी समझते हैं। राहुल ने इन पत्रकारों से वादा किया है कि लोकसभा चुनाव के बाद इन्हें उनके मूल संस्थानों में फिर से नौकरी दिलवा दी जाएगी। ‘वॉर रूम’ की नौकरी को ये पत्रकार भी खूब इंज्वाय कर रहे हैं, क्योंकि यहां काम का कोई तनाव नहीं है। ‘वॉर रूम’ में कोक, काफी की वेंडिंग मशीनों से लेकर किस्म-किस्म के सेंडविच की व्यवस्था है। जब यह पत्रकार फुर्सत में होते हैं तो राहुल की यार्कशायर टेरियर ब्रीड की मादा कुत्ता पिद्दी के संग खेल लिया करते हैं।
सुचारू रूप से चल सकती है संसद
सोमवार से शुरू होने वाले संसद का मानसून सत्र के सुचारू रूप से चलने की संभावना है। कांग्रेस की डेमेज कंट्रोल टीम ने सर्वदलीय बैठक के बाद प्रमुख विपक्षी दलों के नेताओं से मिलने-जुलने का क्रम जारी रखा हुआ है। कांग्रेस रणनीतिकारों ने भाजपा और सपा दोनों दलों के समन्वय के लिए ज्यादा कोशिशें की हैं। सपा नेताओं की चिंता डिफेंस और टेलिकॉम सेक्टर में एफडीआई को लेकर है। वहीं सपा फूड सिक्यूरिटी बिल में एक तरह की पारदर्शिता चाहती है और सरकार से जानना चाहती है कि वे इस योजना को जन वितरण प्रणाली के साथ कैसे जोड़ेगी। वहीं भाजपा मोटे तौर पर फूड सिक्यूरिटी बिल और जमीन अधिग्रहण बिल को संसद में पास कराने के लिए तैयार हो गई है।
एक नए अवतार में अमर
अमर सिंह अपने एक नए सियासी अवतार में सामने आने को तैयार हैं। हालिया दिनों में सोनिया और राहुल से इनकी नज़दीकियां काफी बढ़ी हैं। इन्हें गांधी परिवार से नज़दीक लाने में दिग्गी राजा की एक महती भूमिका रही है। लिहाज़ा आने वाले लोकसभा चुनाव में पोस्ट पोल अलायंस को लेकर क्षेत्रीय दलों के साथ अमर की एक सक्रिय भूमिका हो सकती है। अमर की ममता बनर्जी, जयललिता, करूणानिधि और नवीन पटनायक जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों से काफी दोस्ती है। सो, वे चुनाव पश्चात इन क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस के पाले में भी ला सकते हैं। पूर्व में जब अमर दुबई के एक निजी अस्पताल में अपना इलाज करा स्वदेश लौटने वाले थे तो उनके पुराने मित्र अनिल अंबानी ने अपना एक विशेष चार्टर्ड विमान उन्हें दिल्ली लाने के लिए दुबई भेजा था, पर अमर अंबानी के विशेष विमान की बजाए अपने एक शेख मित्र के चार्टर्ड विमान पर सवार होकर स्वदेश लौटे थे। जब वे दुबई में थे तो सोनिया गांधी ने भी बकायदा उन्हें फोन कर उनका कुशलक्षेम पूछा था।
पलटवार को तैयार मोदी
पार्टी के अंदर और बाहर अपने धुर विरोधियों से निपटने के लिए नरेंद्र मोदी की रणनीति तैयार है। सो, किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए जब आने वाले दिनों में मीडिया में लाल कृष्ण अडवानी, सुषमा स्वराज, यशवंत सिन्हा और शत्रुध्न सिन्हा जैसे भाजपा नेताओं के गड़े मुर्दे उखड़ जाएं। इस काम में मोदी को अमरीका की पीआर फर्म ‘एपको वर्ल्डवाइड’ का हर मुमकिन साथ मिल रहा है। अमरीका में रह रहे अपने कई अनिवासी भारतीय मित्रों की सलाह पर मोदी ने सर्वप्रथम अगस्त 2007 में पीआर कंपनी ‘एपको’ की सेवाएं ली थीं। तब से लेकर आज तक यह कंपनी मोदी और गुजरात को एक ब्रांड के तौर पर स्थापित करने में जुटी है। ‘वायब्रेंट गुजरात’ कैंपेन का आइडिया भी इसी कंपनी का बताया जाता है। सनद रहे कि अमिताभ बगान को गुजरात का ब्रांड एंबेसेडर बनाने और मोदी के लिए ‘नमो’ विशेषण प्रचारित करने में इसी कंपनी की भूमिका थी। सन् 2009 में मोदी ने इस कंपनी के साथ अपने करार को पुन: रिन्यू किया और बताया जाता है कि इस कंपनी के प्रयासों से अब तक गुजरात में 153बिलियन अमरीकी डॉलर का निवेश आ चुका है। इस कंपनी ने ‘वन इस्त्रायल’, ‘वन मलेशिया’ जैसे कई सफल राजनीतिक कैंपेन को परवान चढ़ाया है। भारत में इस कंपनी का आॅपरेशन मीडिया विशेषज्ञ सुकांति घोष देखते हैं।
कांग्रेस में इमेज चमकाने की होड़
अपने युवराज राहुल गांधी की देखा-देखी इनके कई दरबारी मंत्री भी अपनी इमेज चमकाने में जुट गए हैं। सूत्र बताते हैं कि पी.चिदंबरम, कपिल सिब्बल और मनीष तिवारी समेत कई कांग्रेसी मंत्रियों ने अपनी इमेज चमकाने के लिए अलग-अलग पीआर एजेंसियों का सहारा लिया है। वहीं राहुल की हालिया डांट के बाद कांग्रेसी मंत्रियों के तेवर भी ढीले हुए हैं और विपक्ष पर हमला साधने में वे शब्दोंं का भी सोच-समझकर चयन कर रहे हैं।
दिल तो बगाा है जी।
कहते हैं इश्क व मुश्क छुपाए नहीं छुपते, कांग्रेस के एक बड़े और बड़बोले नेता के साथ भी ऐसा ही है। वे एक बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं, अपने मुख्यमंत्रित्व काल में इनका दिल एक एंग्लो इंडियन महिला पर आ गया। इस एंग्लो इंडियन युवती की मां श्रीमती इंदिरा गांधी की गवर्नेंस रह चुकी हैं। तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री साहब को बखूबी इस बात का इल्म था कि यह एंग्लो इंडियन युवती शादी-शुदा है, पर दिल तो बगाा है जी, वे अपने इश्क के तूफां को कहां रोक पाए और उन्होंने उस युवती को एंग्लो इंडियन कोटे से विधान परिषद में नॉमिनेट कर दिया और युवती के वकील पति को राज्य का एटॉर्नी जनरल नियुक्त कर दिया। आज की तारीख में वह युवती जो अब एक परिपक्व महिला हो चुकी है अपने पति और बेटी के साथ दिल्ली से सटे नोएडा में रहती है। पति और बेटी दोनों ही सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते हैं। नेताजी अब भी इस महिला के निरंतर संपर्क में हैं, पर जब मियां-बीवी राज़ी तो क्या करेगा काज़ी। समझा जाता है कि इस राजनेता के देश के तीन शीर्ष उद्योगपतियों की कंपनियों में 100 करोड़ से ज्यादा का निवेश है।
राजनाथ के बड़े मंसूबे
भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह जब से अमेरिका से लौट कर स्वदेश आए हैं उनके इरादे बम-बम हैं, बड़े बोल और बड़े फैसलों के हिमायती हो गए हैं, उनके राजनैतिक सलाहकारों और ज्योतिषियों ने उन्हें समझा दिया है कि ‘भाजपा की ओर से बस दो ही लोग प्रधानमंत्री बनने की रेस में हैं-एक नरेंद्र मोदी, दूसरे स्वयं राजनाथ। नरेंद्र मोदी की पार्टी और पार्टी से बाहर उनकी स्वीकार्यता को लेकर कई प्रश्नचिन्ह लगे हुए हैं। वहीं राजनाथ के नाम का कोई विरोध नहीं, चुनांचे 2014 में उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं कहीं कम नहीं।’ राजनाथ के पांव अब जमीं पर कम, मंदिरों व गुरूओं के दरबार में ज्यादा पड़ रहे हैं। अभी हालिया दिनों में उन्होंने असम के प्रख्यात कामाख्या देवी मंदिर में एक बड़ा यज्ञ करवाया है और इस यज्ञ के निहितार्थ क्या हैं, यह कोई छुपी बात नहीं रह गई।
मोदी को धन देने की होड़
भाजपा से सहानुभूति रखने वाले प्रमुख उद्योगपतियों से नरेंद्र मोदी ने निरंतर संपर्क बनाया हुआ है। सूत्र बताते हैं कि मोदी ने इन उद्योगपतियों से साफ कह रखा है कि वे भाजपा के किसी नेता को व्यक्तिगत तौर पर फंड न करें, उन्हें जो भी पैसा देना है वह पार्टी के केंद्रीय कोष में जमा कराएं। मोदी ने साफ कर दिया है कि आने वाले चुनाव में हर भाजपा प्रत्याशी को कितना धन दिया जाना है इसका निर्धारण वे स्वयं करेंगे। पर उड़ती चिड़िया के पर गिनने में माहिर थैलीशाह मोदी के मंतव्य को भली-भांति भांप गए हैं और इनमें से कईयों ने तो अभी से मोदी को चंदा देना शुरू कर दिया है। देश के एक बड़े उद्योगपति ने तो वादा किया है कि मोदी की इमेज व ब्रांड बिल्डिंग में जितना पैसा खर्च हो रहा है इसका व्यय वे स्वयं वहन करेंगे। सूत्र बताते हैं कि गुजरात से भावनात्मक लगाव रखने वाले इस उद्योगपति ने अभी से इसका खर्च उठाना भी शुरू कर दिया है।
दलबदल की होड़
चुनावी मौसम आ चुका है, लिहाज़ा सियासत में एक-दूसरे के घर आने-जाने की रवायतें भी शुरू हो गई हैं। नरेंद्र मोदी के चुनावी प्रचार की बागडोर संभालने के बाद से भाजपा के बाज़ार भाव में इजाफा हुआ है। सो, अन्य दलों के कई नेता भाजपा ज्वाइन करने को तैयार बैठे हैं। हैरत की बात तो यह कि इन कतारबद्द नेताओं में कांग्रेसी नेताओं की संख्या सबसे ज्यादा है। हरियाणा के एक बड़े बिजनेसमैन टर्न राजनेता ने भी हालिया दिनों में भाजपा के कुछ शीर्ष नेताओं से मिलकर पाला बदल की इ छा जतायी है। सनद रहे कि ये फिलहाल कांग्रेस में हैं और कांग्रेस को चुनावी चंदा देने में उनका कोई सानी नहीं। मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा कांग्रेसी नेता पाला बदल को इ छुक बताए जाते हैं।
...और अंत में
आखिर बकरे की मां कब तक ख़ैर मनाएगी। 2जी मामले में भयंकर उथल-पुथल लाने वाली देश की एक प्रमुख कारपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया को लेकर कोर्ट का रूख सख्त हो सकता है। सूत्र बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के कहने पर नीरा राडिया मामले को जांच के लिए सीबीआई के सुपुर्द किया जा सकता है। (एनटीआई)
Thursday, 11 July 2013
समाचार विस्फोट के दो वर्ष पूरे, अब सप्ताहिक भी होगा प्रकाशित
नागपुर से प्रकाशित हिंदी मासिक पत्रिका समाचार विस्फोट ने सफलतापूर्वक दो वर्ष पूरा कर लिए हैं। अगस्त, 2011 से शुरू हुई यह मासिक पत्रिका ने समाचारों के वैचारिक तेवरों के साथ तेजी से महाराष्टÑ, छत्तीसढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, झारखंड, बिहार एवं ओडिशा के कुछ क्षेत्रों में प्रसार किया हैं।
गत दो वर्षों दो वर्ष में समाचार विस्फोट को पाठकों से मिले रिस्पांस को देखते हुए इसका अन्य क्षेत्रों में भी प्रसार किया जा रहा है। संभावना है कि अगस्त महीने से ही समाचार विस्फोट छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से टेबुलाइट साइज में साप्ताहिक संस्करण के रूप में प्रकाशित होगा। यही से इसे देशभर में प्रसार की योजना है। साप्ताहिक समाचार विस्फोट को ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक पहुंचाने के लिए देश भर से प्रतिनिधियों को जोड़ने का क्रम जारी है। समाचार विस्फोट से स्वतंत्र रूपे से जुड़ने के इच्छुक पत्रकार samachar.visfot@gmail.com संपर्क कर सकते हैं।
नागपुर से प्रकाशित हिंदी मासिक पत्रिका समाचार विस्फोट ने सफलतापूर्वक दो वर्ष पूरा कर लिए हैं। अगस्त, 2011 से शुरू हुई यह मासिक पत्रिका ने समाचारों के वैचारिक तेवरों के साथ तेजी से महाराष्टÑ, छत्तीसढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, झारखंड, बिहार एवं ओडिशा के कुछ क्षेत्रों में प्रसार किया हैं।
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Thursday, 23 May 2013
भारतीय बाजार से चीन मालामाल
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भारत के बड़े बाजार में धंधा कर चोखा मुनाफा बटोरने वाली कंपनियों की दो जमात है। एक वह जो अपने उत्पाद में थोड़ी बहुत गुणवत्ता देकर भारतीय व्यापारियों के ग्राहकों को लुभा रहे हैं, दूसरे वे हैं जो घटिया उत्पाद या धोखा देकर भारतीय व्यापारी, कपंनियां या ग्राहकों का पैसा हड़प ले रही हैं।
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संजय स्वदेश
पड़ोसी देश चीन कभी भी भारत का विश्वस्त नहीं रहा। लेकिन वैश्विक स्तर पर बदले हालात और बाजार के प्रभाव के कारण कूटनीतिक स्तर पर हमेशा दोनों देशों के संबंधों को सकारात्मक बनाये रखने की पहल दोनों देशों की ओ से होती है। वैश्विक स्तर पर मजबूत होते भारत के कदम चीन की आंखों में हमेशा खटकता रहा है। लिहाजा, चीन ने हमेशा से हर मोर्चे पर भारत को कमजोर करने की कोशिश करता रहा है। कभी सीमा में घुसपैठ करके तो कभी देश के महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों के वेबसाइटों साइबर धावा बोलकर मानसिक रूप से अशांत करता है। लेकिन आर्थिक स्तर पर चीन भारत को जिस तरह से खोखला कर रहा है, वह निश्चय ही गंभीर है। मीडिया में भारतीय सीमा पर चीनी सैनिकों की हलचल की खबरों पर नजर ज्यादा रहती है, लेकिन इस हलचल के पीछे चीन से जुड़े आर्थिक मुद्दे अक्सर गौड़ होते गए हैं।
करीब दशक भर पहले जब चीनी माल भारत में सस्ते दामों में पहुंचा तब लोगों ने हाथों-हाथ लिया। हालांकि चीन अभी भी भारत की हर जरूरत की समान यहां तक ही हमारे भगवान की मूर्तियों तक को भेज रहा है। शुरुआती दिनों में वस्तुओं की गुणवत्ता इतनी खराब निकली कि धीरे-धीरे लोगों को विश्वास चीनी वस्तुओं से उठने लगा। लेकिन शुरुआती दौर में चीन ने भारती व्यपारियों को भीषण तरीके से मानसिक आघात पहुंचाया। अब भारत आने वाला चीनी माल में अब थोड़ी बहुत गुणवत्ता आने लगी है। यहीं कारण है कि गुणवत्ता को लेकर टूटा जनता का विश्वास किफायती दाम के कारण फिर बहाल होने लगा है। आम भारतीय बाजार में ब्रांडेट कंपनियों का 20 से 40 हजार में मिलने वाला टेबवलेट चीनी ब्रांड में हूबहू दो-चार हजार में उपलब्ध हो जा रहा है।
जो लोग ब्रांडेड टेबलेट नहीं खरीद पाते हैं, चीनी टेबलेट से टशन मारते हैं। यह तो केवल टेबलेट भर की बात है। खिलौना, देवी-देवताओं की प्रतिमाओं से लेकर, फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं चीनी उत्पाद भारत में उपलब्ध हैं।
समझदार भारतीय उपभोक्ता अब किफायती दर के साथ गुणवत्ता की तुलना कर वस्तुओं को चुनने लगा है। चीन से आयातित सस्ती वस्तुओं से भारतीय कारोबारियों और निर्माताओं पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। सबसे अधिक नुकसान भारत के छोटे और मझौले उद्यमियों पर पड़ा है। भारत के बड़े बाजार में धंधा कर चोखा मुनाफा बटोरने वाली कंपनियों की दो जमात है। एक वह जो अपने उत्पाद में थोड़ी बहुत गुणवत्ता देकर भारतीय व्यापारियों के ग्राहकों को लुभा रहे हैं, दूसरे वे हैं जो घटिया उत्पाद या धोखा देकर देशी व्यापारी, कपंनियां या ग्राहकों का पैसा हड़प ले रही हैं।
हालही में चीन से व्यापार करने वालों को भारतीय दूतावास ने खबरदार करते हुए सचेत रहने को कहा। पिछले वर्ष 86 भारतीय कंपनियों को चीनी कपंनियों ने धोखा दिया। धोखा खाने वाले छोटे और मझोले स्तर के भारतीय कारोबारी थे। दिया है कि भारतीय कंपनियां कोई भी कारोबारी समझौता करने से पहले चीनी कंपनियों की जांच-परख कर लें। जो चीनी चीनी कंपनियां धोखाधड़ी में शामिल पाई गर्इं है, वे रसायन, स्टील, सौर उर्जा के उपकरण, आॅटो व्हील, आर्ट एंड क्राफ्ट्स, हाडर्वेयर और बायोलॉजिकल टेक्नोलॉजी के कारोबार से जुड़ी हैं। ऐसे मामले भी सामने आए हैं जब भारतीय कंपनियों ने चीन से मशीनरी मंगवाई। जब इसकी इंस्टालेशन करने के बाद काम शुरू किया तो मशीन चली ही नहीं। चीनी वेबसाइट देखकर भारतीय व्यापारी सामान खरीदने को आर्डर देते हैं। चीनी कंपनियां उनसे पैसा तो ले लेती है, लेकिन बाद में सामान भेजती ही नहीं। भारतीय दूतावास ऐसी धोखेबाजी चीनी कंपनियों की सूची आॅनलाइन उपलब्ध करा रहा है। चीनी कंपनियों की धोखेबाजी के धंधे से अलग अनेक चीनी कंपनियां भारत में बेहतर धंधा कर मालामाल हो रही हैं। देश की प्रतिष्ठित औद्योगिक संगठन का दावा हैकि चीन भारतीय अर्थव्यवस्था को किसी भी तरह से नुकसान पहुंचाने का खतरा नहीं उठा सकता है क्योंकि उसके भारत से व्यापक व्यापारिक हित जुड़े हुए हैं। भारत के बढ़ते बाजार में चीन की हिस्सेदारी में बड़ी तेजी से बढ़ोतरी हुई है। फिलहाल चीन का भारत में वार्षिक कारोबार 40 अरब डॉलर यानी की करीब 2 लाख 22 हजार करोड़ रुपये हो रहा है। संभावना है कि चालू वित्त वर्ष में यह आंकड़ा बड़ 44 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। एसोचैम का सुझाव है कि भारत और चीन को आपस में व्यापारिक अंतर को पाटने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
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संजय स्वदेश
भारत के बड़े बाजार में धंधा कर चोखा मुनाफा बटोरने वाली कंपनियों की दो जमात है। एक वह जो अपने उत्पाद में थोड़ी बहुत गुणवत्ता देकर भारतीय व्यापारियों के ग्राहकों को लुभा रहे हैं, दूसरे वे हैं जो घटिया उत्पाद या धोखा देकर भारतीय व्यापारी, कपंनियां या ग्राहकों का पैसा हड़प ले रही हैं।
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संजय स्वदेश
पड़ोसी देश चीन कभी भी भारत का विश्वस्त नहीं रहा। लेकिन वैश्विक स्तर पर बदले हालात और बाजार के प्रभाव के कारण कूटनीतिक स्तर पर हमेशा दोनों देशों के संबंधों को सकारात्मक बनाये रखने की पहल दोनों देशों की ओ से होती है। वैश्विक स्तर पर मजबूत होते भारत के कदम चीन की आंखों में हमेशा खटकता रहा है। लिहाजा, चीन ने हमेशा से हर मोर्चे पर भारत को कमजोर करने की कोशिश करता रहा है। कभी सीमा में घुसपैठ करके तो कभी देश के महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों के वेबसाइटों साइबर धावा बोलकर मानसिक रूप से अशांत करता है। लेकिन आर्थिक स्तर पर चीन भारत को जिस तरह से खोखला कर रहा है, वह निश्चय ही गंभीर है। मीडिया में भारतीय सीमा पर चीनी सैनिकों की हलचल की खबरों पर नजर ज्यादा रहती है, लेकिन इस हलचल के पीछे चीन से जुड़े आर्थिक मुद्दे अक्सर गौड़ होते गए हैं।
करीब दशक भर पहले जब चीनी माल भारत में सस्ते दामों में पहुंचा तब लोगों ने हाथों-हाथ लिया। हालांकि चीन अभी भी भारत की हर जरूरत की समान यहां तक ही हमारे भगवान की मूर्तियों तक को भेज रहा है। शुरुआती दिनों में वस्तुओं की गुणवत्ता इतनी खराब निकली कि धीरे-धीरे लोगों को विश्वास चीनी वस्तुओं से उठने लगा। लेकिन शुरुआती दौर में चीन ने भारती व्यपारियों को भीषण तरीके से मानसिक आघात पहुंचाया। अब भारत आने वाला चीनी माल में अब थोड़ी बहुत गुणवत्ता आने लगी है। यहीं कारण है कि गुणवत्ता को लेकर टूटा जनता का विश्वास किफायती दाम के कारण फिर बहाल होने लगा है। आम भारतीय बाजार में ब्रांडेट कंपनियों का 20 से 40 हजार में मिलने वाला टेबवलेट चीनी ब्रांड में हूबहू दो-चार हजार में उपलब्ध हो जा रहा है।
जो लोग ब्रांडेड टेबलेट नहीं खरीद पाते हैं, चीनी टेबलेट से टशन मारते हैं। यह तो केवल टेबलेट भर की बात है। खिलौना, देवी-देवताओं की प्रतिमाओं से लेकर, फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं चीनी उत्पाद भारत में उपलब्ध हैं।
समझदार भारतीय उपभोक्ता अब किफायती दर के साथ गुणवत्ता की तुलना कर वस्तुओं को चुनने लगा है। चीन से आयातित सस्ती वस्तुओं से भारतीय कारोबारियों और निर्माताओं पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। सबसे अधिक नुकसान भारत के छोटे और मझौले उद्यमियों पर पड़ा है। भारत के बड़े बाजार में धंधा कर चोखा मुनाफा बटोरने वाली कंपनियों की दो जमात है। एक वह जो अपने उत्पाद में थोड़ी बहुत गुणवत्ता देकर भारतीय व्यापारियों के ग्राहकों को लुभा रहे हैं, दूसरे वे हैं जो घटिया उत्पाद या धोखा देकर देशी व्यापारी, कपंनियां या ग्राहकों का पैसा हड़प ले रही हैं।
हालही में चीन से व्यापार करने वालों को भारतीय दूतावास ने खबरदार करते हुए सचेत रहने को कहा। पिछले वर्ष 86 भारतीय कंपनियों को चीनी कपंनियों ने धोखा दिया। धोखा खाने वाले छोटे और मझोले स्तर के भारतीय कारोबारी थे। दिया है कि भारतीय कंपनियां कोई भी कारोबारी समझौता करने से पहले चीनी कंपनियों की जांच-परख कर लें। जो चीनी चीनी कंपनियां धोखाधड़ी में शामिल पाई गर्इं है, वे रसायन, स्टील, सौर उर्जा के उपकरण, आॅटो व्हील, आर्ट एंड क्राफ्ट्स, हाडर्वेयर और बायोलॉजिकल टेक्नोलॉजी के कारोबार से जुड़ी हैं। ऐसे मामले भी सामने आए हैं जब भारतीय कंपनियों ने चीन से मशीनरी मंगवाई। जब इसकी इंस्टालेशन करने के बाद काम शुरू किया तो मशीन चली ही नहीं। चीनी वेबसाइट देखकर भारतीय व्यापारी सामान खरीदने को आर्डर देते हैं। चीनी कंपनियां उनसे पैसा तो ले लेती है, लेकिन बाद में सामान भेजती ही नहीं। भारतीय दूतावास ऐसी धोखेबाजी चीनी कंपनियों की सूची आॅनलाइन उपलब्ध करा रहा है। चीनी कंपनियों की धोखेबाजी के धंधे से अलग अनेक चीनी कंपनियां भारत में बेहतर धंधा कर मालामाल हो रही हैं। देश की प्रतिष्ठित औद्योगिक संगठन का दावा हैकि चीन भारतीय अर्थव्यवस्था को किसी भी तरह से नुकसान पहुंचाने का खतरा नहीं उठा सकता है क्योंकि उसके भारत से व्यापक व्यापारिक हित जुड़े हुए हैं। भारत के बढ़ते बाजार में चीन की हिस्सेदारी में बड़ी तेजी से बढ़ोतरी हुई है। फिलहाल चीन का भारत में वार्षिक कारोबार 40 अरब डॉलर यानी की करीब 2 लाख 22 हजार करोड़ रुपये हो रहा है। संभावना है कि चालू वित्त वर्ष में यह आंकड़ा बड़ 44 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। एसोचैम का सुझाव है कि भारत और चीन को आपस में व्यापारिक अंतर को पाटने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
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संजय स्वदेश
Thursday, 25 April 2013
Wednesday, 20 March 2013
प्राचीन भाषा की हत्या का उपक्रम
संदर्भ : सिविल सेवा परीक्षा से पाली को हटाना
तर्क देने वाले कह सकते हैं कि आज पालि बोलता कौन है? यही सवाल संस्कृत और उर्दू को लेकर भी उठाया जा सकता है। संस्कृत बोलने वाले एक प्रतिशत लोग भी देश में नहीं है। जिस भाषा से रोजगार उपलबध होती है, वह उतना ही समृद्ध होती है। रोजगार उपलब्ध करा कर ही अंग्रेजी ने हिंदी को मात दे दी। पाली संस्कृत को पछाड़ रही है।
संजय स्वदेश
संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा के पाठ्यक्रम से अंग्रेजी की अनिवार्यता को फिलहाल रोक कर के केंद्र सरकार ने खूब वाहवाही बटोरी। यह खबर कई प्रमुख समाचारपत्रों के प्रमुखता से प्रकाशित हुई। हिंदी प्रेमियों ने खूब स्वागत किया। लेकिन इसी के साथ आयोग ने भारत की प्राचीन भाषा पालि का गला घोंट दिया। किसी को कोनोकान खबर नहीं लगी। पालि भाषा एवं साहित्य अनुसंधान परिषद ने इसके खिलाफ आवाज उठाई। पर अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता है। न कहीं शोर सुनाई दिया और न ही कई कोई बड़ा विरोध। आयोग की परीक्षाओं से अंग्रेजी की अनिवार्यता को हटाने के लिए वर्षों आंदोलन चले। करीब एक दशक पहले की बात है तब आयोग के मुख्य द्वार पर हिंदी समर्थित विरोधियों का एक तंबू हमेशा दिखता था। वहां के बैनर पर यह लिखा होता था कि हिंदी के समर्थन में चलने वाला देश में अब तक का सबसे बड़ा आंदोलन। एक बार दिल्ली में शाहजहां रोड़ से गुजरते वक्त किसी ने बताया था कि इसके समर्थन में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज उतर चुके हैं। लेकिन कब उस आंदोलन का दम घुट गया और प्रदर्शनकारियों का तंबू हट गया, किसी को कानोकान खबर नहीं चली। ऐसे समय में जब न कोई आंदोलन था और न ही कहीं से कोई दबाव। आयोग ने हिंदी के प्रति हमदर्दी दिखाते हुए अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त कर देने की घोषणा कर दी। बात असानी से हजम नहीं होती। जब समाज में अंग्रेजी का भूत भूत सवार हो रहा हो, तब अपने आप आयोग ने आखिर रहमदिली क्यों दिखाया। ढेरों ऐसे प्रतिभाशाली लोग हैं जिन्होंने आयोग की अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण परीक्षा में असफलता की मुंह खाई। लेकिन अन्य क्षेत्रों में सफलता के शिखर पर पहुंचे। फिलहाल चर्चा, आयोग के पाठ्यक्रम से पालि को हटाने को लेकर है। प्राचीनकाल की जनभाषा और धार्मिक अल्पसंख्यकों बौद्धों की एक मात्र भाषा को हटाने के पीछे आयोग की क्या मंशा रही, इसे न ही उसने बताना उचित समझा और न ही सार्वजनिक रूप से समझाना। पालि भषा के विषय को लेकर सिवलि सेवा की मुख्य परीक्षा देने वाले प्रतिभागियों की संख्या हजारों में है। जिसमें से अधिकतर प्रतिभागी सफलता को प्राप्त करते हैं। मजेदार बात यह है कि सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा में इस भाषा को ऐच्छिक विषय के रूप में चुनने वाले अधिकतर प्रतिभागी दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदाय से होते हैं। आयोग के कठिन मापदंडों के कारण ही वर्षों से आरक्षित वर्ग के भरपूर अफसर बनाने में पूरी तरह से नकाम रहे हैं। शीर्ष सेवा में सैकड़ों पद आरक्षित वर्ग के रिक्त पड़े हैं।
महंगे और पहुंच से दूर पाठ्यक्रमों में दाखिला नहीं मिलने के कारण हर वर्ष हजारों विद्यार्थी पालि और बौद्ध अध्ययन में दाखिला लेते हैं। हालात तो यह है कि एक ओर जहां विश्वविद्यालयों के संस्कृत विभाग में सन्नाटा पसरता जा हरा है, वहीं पालि और बौद्ध अध्ययन के विभाग गुलजार होने लगे हैं। इसके बाद भी बिना किसी ठोस तर्क दिए बगैर पालि के प्रति यूपीएससी की मनमानी उसकी साकारात्मक मंशा को जाहिर नहीं करती है। दलित, आदिवासी और पिछड़े हमेशा ही इस बात को लेकर यह शोर मचाते रहे हैं कि जिन कठिन राहों को वे अपनी मेहनत से आसान बना रहे हैं नीति नियंता किसी न किसी तरह से उनके राह में और अड़ंगा डालते हैं। सिविल सेवा परीक्षा से पालि का हटाना देश के उन हजारों युवाओं के सपने तोड़ने जैसा है जो पालि का अध्ययन कर रहे हैं और इस विषय के साथ देश की सर्वोच्च प्रतिष्ठित सेवा क्षेत्र अपनी काबिलियत सिद्ध करना चाहते हैं।
सिविल सेवा की परीक्षा में संस्कृत, उर्दू और पंजाबी को अभी भी रखा गया है। जैसे संस्कृत हिंदुओं से, उर्दू मुस्लिमों से तथा पंजाबी सिक्खों से संबंधित है। वैसे ही पालि बौद्ध धर्म के लोगों से संबंधित है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में इनकी संख्या बढ़ रही है। भविष्य में निश्चय ही समाज में इस भाषा की प्रतिष्ठा और रूढ़ होगी। तर्क देने वाले कह सकते हैं कि आज पालि बोलता कौन है? यही सवाल संस्कृत और उर्दू को लेकर भी उठाया जा सकता है। संस्कृत बोलने वाले एक प्रतिशत लोग भी देश में नहीं है। संस्कृत भाषा के प्रति बचे खुचे लोगों का भी मोहभंग हो रहा है। विभिन्न विश्वविद्यालयों में संचालित संस्कृत के पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए पर्याप्त संख्या में विद्यार्थी भी नहीं पहुंच रहे हैं। लेकिन पालि भाषा की स्थिति संस्कृत से उलट है। वर्तमान समय में पालि को लगभग 55 विश्वविद्यालयों में पालि एवं बौद्ध अध्ययन विषयों का अध्यपन हो रहा है। विदेशों को छोÞड़कर सिर्फ भारत में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग हर साल दो बार यूजीसी नेट एवं जेआरएफ की परीक्षा पालि भाषा में भी आयोजित करवा रहा है। सभी लगभग 55 विश्वविद्यालयों और उनके संबंद्ध कॉलेजों में स्रातक, एमए, एमफिल, पीएचडी की उपधियां दी जाती है। इसके साथ ही पालि भाषा एवं साहित्य में प्रमाण-पत्र, डिप्लोमा एवं पालि आचार्य की भी उपाधि दी जाती है। इतना ही नहीं वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, बिहार माध्यमिक शिक्षा बोर्ड एवं महाराष्टÑ माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में भी पालि भाषा विषय की पढ़ाई हाई स्कूल एवं इंटरमीडिएट कक्षाआ में होती है। इसके अलावा देशभर के करीब पचास से ज्यादा विश्वविद्यालयों में पाली भाषा विभाग संचालित है। पालि भाषा के बिना प्राचीन भारतीय इतिहास को जनाना कठिन ही नहीं, अपितु असंभव भी है, क्योंकि पालि भाषा भारत देश की प्राच्य भाषाओं (पालि,प्रकृत व संस्कृत) में से एक महत्पूर्ण भाषा है। ऐतिहासिक महत्व की दृष्टि ही नहीं बल्कि सार्क देशों और दक्षिणी एशियाई देशों के साथ हमारी विदेश नीतियों को भी यह भाषा प्रभावित करती है। क्योंकि इन देशों में बौद्ध धर्म का प्रभाव ज्यादा है। तमाम सार्थक बिंदुओं की अनदेखी करते हुए केवल पालि भाषा को यूपीएसी की परीक्षा से अचानक हटाने का निर्णय अदूरदर्शिता नहीं है। जिस भाषा से रोजगार उपलबध होती है, वह उतना ही समृद्ध होती है। रोजगार उपलब्ध करा कर ही अंग्रेजी ने हिंदी को मात दे दी। पाली संस्कृत को पछाड़ रही है। ऐसे समय में जब यूपीएससी द्वारा पालि को पाठ्यक्रम से हटाने का निर्णय इसका गला घोंटने से कम नहीं है।
तर्क देने वाले कह सकते हैं कि आज पालि बोलता कौन है? यही सवाल संस्कृत और उर्दू को लेकर भी उठाया जा सकता है। संस्कृत बोलने वाले एक प्रतिशत लोग भी देश में नहीं है। जिस भाषा से रोजगार उपलबध होती है, वह उतना ही समृद्ध होती है। रोजगार उपलब्ध करा कर ही अंग्रेजी ने हिंदी को मात दे दी। पाली संस्कृत को पछाड़ रही है।
संजय स्वदेश
संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा के पाठ्यक्रम से अंग्रेजी की अनिवार्यता को फिलहाल रोक कर के केंद्र सरकार ने खूब वाहवाही बटोरी। यह खबर कई प्रमुख समाचारपत्रों के प्रमुखता से प्रकाशित हुई। हिंदी प्रेमियों ने खूब स्वागत किया। लेकिन इसी के साथ आयोग ने भारत की प्राचीन भाषा पालि का गला घोंट दिया। किसी को कोनोकान खबर नहीं लगी। पालि भाषा एवं साहित्य अनुसंधान परिषद ने इसके खिलाफ आवाज उठाई। पर अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता है। न कहीं शोर सुनाई दिया और न ही कई कोई बड़ा विरोध। आयोग की परीक्षाओं से अंग्रेजी की अनिवार्यता को हटाने के लिए वर्षों आंदोलन चले। करीब एक दशक पहले की बात है तब आयोग के मुख्य द्वार पर हिंदी समर्थित विरोधियों का एक तंबू हमेशा दिखता था। वहां के बैनर पर यह लिखा होता था कि हिंदी के समर्थन में चलने वाला देश में अब तक का सबसे बड़ा आंदोलन। एक बार दिल्ली में शाहजहां रोड़ से गुजरते वक्त किसी ने बताया था कि इसके समर्थन में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज उतर चुके हैं। लेकिन कब उस आंदोलन का दम घुट गया और प्रदर्शनकारियों का तंबू हट गया, किसी को कानोकान खबर नहीं चली। ऐसे समय में जब न कोई आंदोलन था और न ही कहीं से कोई दबाव। आयोग ने हिंदी के प्रति हमदर्दी दिखाते हुए अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त कर देने की घोषणा कर दी। बात असानी से हजम नहीं होती। जब समाज में अंग्रेजी का भूत भूत सवार हो रहा हो, तब अपने आप आयोग ने आखिर रहमदिली क्यों दिखाया। ढेरों ऐसे प्रतिभाशाली लोग हैं जिन्होंने आयोग की अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण परीक्षा में असफलता की मुंह खाई। लेकिन अन्य क्षेत्रों में सफलता के शिखर पर पहुंचे। फिलहाल चर्चा, आयोग के पाठ्यक्रम से पालि को हटाने को लेकर है। प्राचीनकाल की जनभाषा और धार्मिक अल्पसंख्यकों बौद्धों की एक मात्र भाषा को हटाने के पीछे आयोग की क्या मंशा रही, इसे न ही उसने बताना उचित समझा और न ही सार्वजनिक रूप से समझाना। पालि भषा के विषय को लेकर सिवलि सेवा की मुख्य परीक्षा देने वाले प्रतिभागियों की संख्या हजारों में है। जिसमें से अधिकतर प्रतिभागी सफलता को प्राप्त करते हैं। मजेदार बात यह है कि सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा में इस भाषा को ऐच्छिक विषय के रूप में चुनने वाले अधिकतर प्रतिभागी दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदाय से होते हैं। आयोग के कठिन मापदंडों के कारण ही वर्षों से आरक्षित वर्ग के भरपूर अफसर बनाने में पूरी तरह से नकाम रहे हैं। शीर्ष सेवा में सैकड़ों पद आरक्षित वर्ग के रिक्त पड़े हैं।
महंगे और पहुंच से दूर पाठ्यक्रमों में दाखिला नहीं मिलने के कारण हर वर्ष हजारों विद्यार्थी पालि और बौद्ध अध्ययन में दाखिला लेते हैं। हालात तो यह है कि एक ओर जहां विश्वविद्यालयों के संस्कृत विभाग में सन्नाटा पसरता जा हरा है, वहीं पालि और बौद्ध अध्ययन के विभाग गुलजार होने लगे हैं। इसके बाद भी बिना किसी ठोस तर्क दिए बगैर पालि के प्रति यूपीएससी की मनमानी उसकी साकारात्मक मंशा को जाहिर नहीं करती है। दलित, आदिवासी और पिछड़े हमेशा ही इस बात को लेकर यह शोर मचाते रहे हैं कि जिन कठिन राहों को वे अपनी मेहनत से आसान बना रहे हैं नीति नियंता किसी न किसी तरह से उनके राह में और अड़ंगा डालते हैं। सिविल सेवा परीक्षा से पालि का हटाना देश के उन हजारों युवाओं के सपने तोड़ने जैसा है जो पालि का अध्ययन कर रहे हैं और इस विषय के साथ देश की सर्वोच्च प्रतिष्ठित सेवा क्षेत्र अपनी काबिलियत सिद्ध करना चाहते हैं।
सिविल सेवा की परीक्षा में संस्कृत, उर्दू और पंजाबी को अभी भी रखा गया है। जैसे संस्कृत हिंदुओं से, उर्दू मुस्लिमों से तथा पंजाबी सिक्खों से संबंधित है। वैसे ही पालि बौद्ध धर्म के लोगों से संबंधित है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में इनकी संख्या बढ़ रही है। भविष्य में निश्चय ही समाज में इस भाषा की प्रतिष्ठा और रूढ़ होगी। तर्क देने वाले कह सकते हैं कि आज पालि बोलता कौन है? यही सवाल संस्कृत और उर्दू को लेकर भी उठाया जा सकता है। संस्कृत बोलने वाले एक प्रतिशत लोग भी देश में नहीं है। संस्कृत भाषा के प्रति बचे खुचे लोगों का भी मोहभंग हो रहा है। विभिन्न विश्वविद्यालयों में संचालित संस्कृत के पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए पर्याप्त संख्या में विद्यार्थी भी नहीं पहुंच रहे हैं। लेकिन पालि भाषा की स्थिति संस्कृत से उलट है। वर्तमान समय में पालि को लगभग 55 विश्वविद्यालयों में पालि एवं बौद्ध अध्ययन विषयों का अध्यपन हो रहा है। विदेशों को छोÞड़कर सिर्फ भारत में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग हर साल दो बार यूजीसी नेट एवं जेआरएफ की परीक्षा पालि भाषा में भी आयोजित करवा रहा है। सभी लगभग 55 विश्वविद्यालयों और उनके संबंद्ध कॉलेजों में स्रातक, एमए, एमफिल, पीएचडी की उपधियां दी जाती है। इसके साथ ही पालि भाषा एवं साहित्य में प्रमाण-पत्र, डिप्लोमा एवं पालि आचार्य की भी उपाधि दी जाती है। इतना ही नहीं वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, बिहार माध्यमिक शिक्षा बोर्ड एवं महाराष्टÑ माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में भी पालि भाषा विषय की पढ़ाई हाई स्कूल एवं इंटरमीडिएट कक्षाआ में होती है। इसके अलावा देशभर के करीब पचास से ज्यादा विश्वविद्यालयों में पाली भाषा विभाग संचालित है। पालि भाषा के बिना प्राचीन भारतीय इतिहास को जनाना कठिन ही नहीं, अपितु असंभव भी है, क्योंकि पालि भाषा भारत देश की प्राच्य भाषाओं (पालि,प्रकृत व संस्कृत) में से एक महत्पूर्ण भाषा है। ऐतिहासिक महत्व की दृष्टि ही नहीं बल्कि सार्क देशों और दक्षिणी एशियाई देशों के साथ हमारी विदेश नीतियों को भी यह भाषा प्रभावित करती है। क्योंकि इन देशों में बौद्ध धर्म का प्रभाव ज्यादा है। तमाम सार्थक बिंदुओं की अनदेखी करते हुए केवल पालि भाषा को यूपीएसी की परीक्षा से अचानक हटाने का निर्णय अदूरदर्शिता नहीं है। जिस भाषा से रोजगार उपलबध होती है, वह उतना ही समृद्ध होती है। रोजगार उपलब्ध करा कर ही अंग्रेजी ने हिंदी को मात दे दी। पाली संस्कृत को पछाड़ रही है। ऐसे समय में जब यूपीएससी द्वारा पालि को पाठ्यक्रम से हटाने का निर्णय इसका गला घोंटने से कम नहीं है।
Thursday, 14 February 2013
Thursday, 7 February 2013
बांझ मर्दों की बढ़Þती फौज
एक समय था, जब किसी निसंतान महिला को बांझ कर कह न केवल मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था, बल्कि उसे घर-परिवार के साथ समाज में भी दूसरे कोटी का मान लिया जाता था। समय बदला तो महिलाओं के माथे से ऐसे कलंक हटने लगे लगे। ए कलंक अब पुरुषों के माथे पर आने लगी है। विज्ञान ने यह हकीकत बताई कि संतान नहीं होने का एकमात्र कारण किसी महिला का बांझ होना नहीं है, बल्कि बांझ तो पुरुष भी हो सकते हैं।
अब केवल महिलाएं बांझ नहीं होती। अब मर्द भी इस कतार में खड़े हैं। मजेदार बात यह है कि बांझ मर्दों की फौज लगातार बढ़Þ रही है। इस समस्या को दूर करने का मेडिकल धंधा भी सधे हुए कदमों से पांव पसार रहा है। देश के प्रमुख शहरों में मर्दों के बांझपन के इलाज के लिए अलग से सेंटर खुल गए हैं। अश्चर्य की बात तो यह है कि अनेक युवाओं को यह पता ही नहीं कि वे आधुनिक जीवन शैली में बाप बनने की ताकत खो चुके हैं। मेडिकल कंपनियां इन्हें एक बाजार के रूप में देख रही है।
देवांशु नारायण
ज्यादा से ज्यादा धन की चाहत और बदलते समाज और परिदृश्यश् में तनाव से ग्रसित मर्द भी बांझपन का शिकार होने लगा है, ताजा शोध और डाक्टरों से जो जानकारी मिलती है वह चौंकाने वाली है। वजह चाहे जो भी हो, लेकिन हमेशा समाज ने महिलाओं के बारे में ज्यादा सोचा और बांझपन का ताज उन्हीं पर मढ़ा गया। शोध बताता है कि संतानहीनता में अब पुरुष भी बड़े कारण बन गए हैं। जिसमें शुक्राणुओं के नए मामले, तनाव से परेशानी, लोगों की जीवनशैली, मोटापे की महामारी और अत्यधिक दवाइयों का सेवन मुख्य कारक बताए गए हैं।
दो साला पहले की एक रिपोर्ट है। उसके अनुसार आज के पुरुष प्रधान समाज के 10 प्रतिशत युवा पुरुषों के शुक्राणुओं की गुणवत्ता, मात्रा और निर्माण में भारी कमियां पाई गई हैं। साथ ही 6 प्रतिशत पुरुष बांझपन और 14 प्रतिशत अंडाशय संबंधी विफलता क्रोमोसोम में गड़बड़ी के कारण बाप बनने की क्षमता खो चुके हैं। रिपोर्ट में बांझपन के कारण 40 प्रतिशत पुरुष, 40 प्रतिशत महिलाएं तथा 20 प्रतिशत अभी भी अभूझ बने हुए हैं। ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं हैं, बल्कि पिछले 50 वर्षो में दुनिया भर के पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या 50 फीसदी कम हो गई है। डॉक्टर मानते हैं कि पुरुष में बांझपन के कारण और इसे कम करने के लिए मेडिकल साइंस को और शोध की जरूरत है। शोध रिपोर्ट के मुताबिक जानकारी मिलती है, वह मर्दों की नींद उड़ाने के लिए काफी है।
आश्चर्य की बात तो यह है कि अनेक युवा ऐसे हैं तो बांझपन के अदृश्य बीमारी से ग्रस्त हो चुके हैं। उन्हें इस बात का पता भी नहीं है कि वे भविष्य में बाप बनने कीक्षमता खो चुके हैं। रिपोर्ट के मुताबिक आज हमारे देश और प्रदेश में पांच में से एक दंपती निसंतान है। यह आंकड़ा स्थिर नहीं है। हर वर्ष निसंतान दंपतियों की संख्या बढ़Þती जा रही है। शहरों की 16 प्रतिशत महिलाएं निस्संतान हैं। भारत में 1981 के बादे से शहरी क्षेत्रों में संतानहीनता के मामले में 50 प्रतिशत की बढ़Þोतरी हुई है। पुरुष के मुख्य कारणों में 37 प्रतिशत वैरीकोसील, 25 प्रतिशत इंजियोपैथिक, 10 प्रतिशत शुक्राणुओं में गड़बड़ी, 9 प्रतिशत अंडकोष में खराबी बताया गया है। वहीं महिलाओं में बांझपन की समस्याएं लंबे अरसे से जुड़ी हैं, जिसमें 37 प्रतिशत से उम्र का अधिक होना, 22 प्रतिशत फैलोपियन ट्यूब की समस्या, 20 प्रतिशत पालीसिस्टिक ओवरी, 18 प्रतिशत जननांगों में टीवी और 10 प्रतिशत आनुवांशिक समस्याएं का होना है।
आंकड़ों के मुताबिक भारत के 9 करोड़ पुरुष बाप होने की क्षमता की कमी के शिकार हो चुके हैं। इस आंकड़े को बढ़Þते देख मेडिकल कंपनियां इन्हें एक बड़े उभरते हुए बाजार के रूप में देख रही है। अनुमान के आधार पर विशेषज्ञ कहते है कि देश में बांझपन के इलाज के लिए उपयोग होने वाला दवा का कुल करोबार करीब 90 करोड़ से एक अरब तक का हो चला है। यह यह दवा का बाजार फिर फलफूल रहा है। इसके साथ ही इसके उपचार का करोबार हर साल 20 से 30 प्रतिशत की दर से आगे बढ़Þ रहा है।
हाल ही में प्रकाशित एक प्रतिष्ठित पत्रिका की रिपोर्ट के मुताबिक देश में बांझपन के इलाज के लिए 40 हजार चक्र चलते हैं, जबकि 2000 में इसकी संख्या सिर्फ 7 हजार थी। आज के समाज या वर्ग में शिक्षित युवा की संख्या ज्यादा है, वे किसी भी तकलीफ या परेशानी में तुरंत डाक्टरों से मिलते हैं और खुलकर बात करते हैं। अगर दंपतियों की बात माने तो उनका कहना होता है कि घर, परिवार और समाज को देखते हुए बच्चों का जीवन में होना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। कई मामले तो ऐसे भी रहे हैं जहां भारतीय परंपरा में लक्ष्मी की संज्ञा प्राप्त नारियों को फरमान तक सुना दिया जाता है कि इतने समय के अंदर आपको बच्चे पैदा करना है, अगर नहीं तो पुरुष दूसरी शादी करता है और पहली लक्ष्मी आत्महत्या, आत्मदाह या आकाल मृत्यु को अपनाती है। जरा सोचिए इस विषय पर कि क्या इसका दोषी सिर्फ महिलाएं हैं, तो उत्तर मिलेगा नहीं, कहीं न कहीं पुरुष भी जींदगी की उहा-पूह में बांझपन के शिकार हो गए हैं। भारत में बच्चा पाने या जन्म देने की भी कीमत और इलाज हैं। जैसा इलाज वैसी कीमत। अगर आइयूआई के तहत गर्भाधारण किया जाता है तो इसमें 3 से 15 हजार तक खर्च आते हैं। एक अन्य इलाज में आइवीएफ के तहत गर्भाश्य को दवा के जरिए अंडाणु पैदा करने के लिए प्रेरित किया जाता है, फिर उन्हें गर्भाशय से बाहर निकालकर निषेचित किया जाता है, भ्रूण को वापस गर्भ में रख दिया जाता है और इसमें प्रति चक्र 50 हजार से 1 लाख 50 हजार तक खर्च हो जाते हैं। इसी तहत तीसरी विधि आसीएफआई में लैब में प्रत्एक अंडाणु में एक शुक्राणु डालकर उन्हें निषेचित किया जाता है और इसमें 80 हजार से 1 लाख 50 हजार खर्च हो जाते हैं।
आज के समाज में 17 प्रतिशत बांझ स्त्रियों को वैवाहिक समस्याएं झेलनी पड़ती है। बच्चे वाली 2 प्रतिशत के साथ भी ऐसा होता है। मुंबई की डॉ. फिरूजा कहती हैं कि दंपती आजकल बहुत एहतियात बरतते हैं, वे सामान्य बात पर जनरल फिजिशियन या स्त्रीरोग विशेषज्ञों से मिलने के बजाए सीधे इनफर्टिलिटी विशेषज्ञ से मिलने जाते हैं। डॉ. इंदिरा बताती हैं कि बांझपन की समस्या सरकार की योजनाओं में शामिल नहीं हैं, निस्संतान दंपतियों को बच्चा पैदा कराने में मदद कराने का कोई प्रावधान नहीं है। एबरडीन डॉ. शिलादित्य का कहना है कि संतानहीनता की परिस्थितियों का पूरा ज्ञान न होना लोगों का जीवन बरबाद कर सकता है। विकासशील देशों में इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य का मामला मानना चाहिए।
लेखक परिचय
देवांशु नारायण : युवा पत्रकार। पटना से मंजिल की तलाश में म.प्र. सागर सेंट्रल यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता की पढ़ाई, वहीं दैनिक भास्कर में रिर्पोटिंग और अखबार की व्यवहारिक टेÑनिंग। पटना मौर्य टीवी में छह माह तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के तानेबाने के साथ झूठों की फौज को समझा। अब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में दैनिक हरिभूमि के संपादकीय सहयोगी के रूप में समाचार जगत को जानते-समझते बेहतर पत्रकारिता का भविष्य देख रहे हैं।
'बेडरूम संकट' से जूझते दुनिया भर के मर्द!
from bbc
भागती आधुनिक जीवनशैली, इससे उत्पन्न तनाव, इस तनाव से बचने के लिए सिगरेट और शराब का सहारा- पुरुषों को बेडरूम में निष्क्रिय बना रहा है। कभी मर्दानगी पर इतराने वाले मर्द अब अपनी महिला साथी से नजरें चुराने लगे हैं।
यह खबर पढ़कर अजीब लगे, लेकिन पूरी दुनिया के मर्दों के सामने 'बेडरूम संकट' मुंह बाए खड़ा है। नपुंसकता, बांझपन और शीघ्रपतन की समस्या ने बेडरूम के अंदर दुनिया भर के मर्दों का विश्वास हिला दिया है। अनियमित खानपान, खानपान में पोषकता का अभाव, फास्ट फूड और कोल्डड्रिंक पर बढ़ÞÞती निर्भरता, शारीरिक श्रम में कमी, तेज भागती आधुनिक जीवनशैली, इससे उत्पन्न तनाव, इस तनाव से बचने के लिए सिगरेट और शराब का सहारा- पुरुषों को बेडरूम में निष्क्रिय बना रहा है। कभी मर्दानगी पर इतराने वाले मर्द अब अपनी महिला साथी से नजरें चुराने लगे हैं।
फ्रांसिसी मर्द पर हाल ही में हुए एक अध्ययन ने दर्शा दिया है कि न केवल फ्रांस के मर्द, बल्कि पूरी दुनिया के पुरुष बेडरूम में संकट का सामना कर रहे हैं। आधुनिक जीवनशैली के कारण मर्दो के वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या लगातार कम हो रही है। यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब 'शुक्राणु विहीन वीर्य' हर देश के पुरुषों की समस्या बन जाएगी।
'ह्यूमन रिप्रोडक्शन' नाम के जर्नल में छपे शोध के मुताबिक फ्रांस में 26,600 मर्दों के वीर्य का परीक्षण किया गया। परीक्षण में पाया गया कि 16 वर्षों के भीतर इन मर्दों में 32.3% शुक्राणु घटे हैं। मतलब फ्रांसिसी मर्दों के शुक्राणुओं की संख्या साल 1989 से साल 2005 के बीच एक तिहाई गिरी है। वैसे जीव विज्ञानियों का मानना है कि पुरुषों के वीर्य में जो शुक्राणुओं की संख्या है वह अभी भी प्रजनन के लिए पर्याप्त है, लेकिन जिस दर से शुक्राणु क्षरण हो रहा है वह भविष्य के लिए चिंता का विषय है।
इस अध्ययन से जुड़े डॉक्टर जोएल ला मोए इसे गंभीर चेतावनी करार दे रहा है। उनका कहना है कि शुक्राणुओं के परीक्षण के लिए बड़े पैमाने पर किया गया यह अपनी तरह का पहला अध्ययन है, जो दर्शा रहा है कि पुरुषों के वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या में लगातार कमी जन स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
ब्रिटेन के शेफील्ड विश्वविद्यालय के डॉक्टर एलन पेसी कहते है, शुक्राणुओं की संख्या में पाई गई गिरावट वैसे तो अब भी 'नॉर्मल रेंज' में है। उनके अनुसार, नर प्रजनन के लिए प्रति मिलीलीटर डेढ़ करोड़ शुक्राणुओं की जरुरत होती है। अध्ययन में प्रति मिलीमीटर चार करोड़ से अधिक शुक्राणु पाए गए हैं। लेकिन शुक्राणुओं की संख्या में कमी आ रही है, इससे इनकार तो नहीं ही किया जा सकता है।
आधुनिक लाइफस्टाइल में गड़बड़ ही गड़बड़ है
एडिनबरा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रिचर्ड शार्प के अनुसार, हमारे आधुनिक लाइफस्टाइल में सबकुछ गड़बड़ है। अनियमित खान-पान और खानपान में जिस तरह से रसायनों का प्रयोग हो रहा है यह सब शायद उसी का असर है। वैसे इसके अहम कारणों को खोजा जाना चाहिए, क्योंकि मुद्दा गंभीर है।
आधुनिक जीवनशैली, वसा युक्त भोजन, हमारे जीवन में रसायनों की बढ़ÞÞती मौजूदगी, काम का बढ़ÞÞता दबाव और उससे उत्पन्न तनाव, सिगरेट और शराब ने उस अंग पर चोट किया है, जो मर्दों के लिए 'मर्दानगी' का पर्याय है। आखिर पुरुषों की 'मर्दानगी' की हेकड़ी 'लिंग दंभ' की वजह से ही तो है...और 'लिंग शिथिलता' ने इस हेकड़ी की हवा निकालने की शुरुआत कर दी है...भले ही अभी यह फ्रांस में दिख रहा है, लेकिन यदि अध्ययन हो तो हर देश के मर्द का 'लिंग' उन्हें धोखा देता दिख जाएगा।
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आईपीओ से पैसे जुटाकर 87 कंपनियां फरार
नई दिल्ली। पिछले वित्त वर्ष के अंत तक ऐसी 87 लापता कंपनियां थीं जिन्होंने आईपीओ के जरिए राशि जुटायीं लेकिन बाद में उनका पता नहीं लग सका। कार्पोरेट मामलों के मंत्री सचिन पायलट का कहना है कि लापता कंपनियों की सूची में 238 कंपनियां हैं। इन कंपनियों में से 151 का पता लगा लिया गया है जबकि अन्य 87 कंपनियों का अभी तक पता नहीं चल सका है। 31 मार्च 2012 के आंकड़ों के अनुसार 87 कंपनियां ऐसी थीं जिन्होंने आरंभिक सार्वजनिक पेशकश (आईपीओ) के जरिए राशि जुटायी थी। सरकार और सेबी द्वारा ऐसे मामलों में नजर रखी जा रही है। देश में व्यापार शुरू करने के लिए माहौल में सुधार किया जा रहा है और इस संबंध में अधिकतर विलंब राज्य स्तरीय अनुमोदनों के कारण होता है। पायलट ने कहा कि देश में कारोबार शुरू करने के लिए विभिन्न प्रावधानों को आसान बनाया गया है और कंपनी को रजिस्टर करने के लिए लगने वाले समय को कम करते हुए इसे 48 घंटा कर दिया गया है। निदेशक की पहचान संख्या और कंपनी के नाम की उपलब्धता जैसे विषय को 24 घंटों के अंदर हल किया जा सकता है।
कंपनी विधेयक में शुद्ध लाभ का कम से कम दो प्रतिशत भाग कार्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) के तहत खर्च किए जाने के प्रावधान के संबंध में कंपनियों की ओर से कोई आपत्ति नहीं मिली है। मंत्रालय को कंपनी विधेयक में सीएसआर के प्रावधान को लेकर किसी कंपनी की ओर से कोई आपत्ति या विरोध नहीं मिला है। मंत्री पायलट ने शीतसत्र के दौरान संसद में कहा कि इस प्रावधान में यह भी कहा गया है कि अगर कोई कंपनी सीएसआर की राशि खर्च नहीं करती है तो उसे बोर्ड की रिपोर्ट में इसका कारण बताना होगा।
चिपक कर सोने का धंधा नया धंधा
एक घंटे में कमाती है तीन हजार
न्यूयॉर्क। बिस्तर पर एक लड़का-लड़की चैन की नींद सो रहे हैं। पहली नजर में आपको यह पति-पत्नी लगे, लेकिन हो सकता है कि इसी बिस्तर पर अगले कुछ घंटों में लड़की के सााि दूसरा शख्त हो। पलभर में ही आप लड़की के चरित्र पर सवाल खड़ा कर सकते हैं, लेकिन आपको बता दे कि यह लड़की पेशेवर कडलर (गले लगाने वाली) है। 29 साल की जैकी सैमुअल इस तरह अनजान मर्दों के साथ प्रतिदिन सोने के 360 डॉलर और एक घंटे के 60 डॉलर (करीब 14 हजार रुपए और 3 हजार रुपए) लेती है। पैसों की कमी के कारण जैकी ने इस काम को शुरू किया है। उनका कहना है कि इसमें कुछ भी बुरा नहीं है। मुझे अपनी पढ़ाई और अपने बच्चे के लिए यह काम करना पसंद है।
जैकी एक हफ्ते में तकरीबन 30 पुरुषों के साथ हमबिस्तर होती हैं, लेकिन इसमें कोई भी अश्लील हरकत नहीं की जाती। उनके यहां आने वाले लोगों में अपराधी से लेकर सैनिक भी होते हैं। जैकी बताती हैं कि फिर भी लोग इसे बुरा मानते हैं। हालांकि उनके इस काम धंधे से ज्यादा लोगों को खबर नहीं है, लेकिन उन्हें कॉलेज से निकालने की चेतावनी मिल चुकी है। कई बार जैकी के साथी छात्र उसे वेश्या तक कहते हैं। बकौल जैकी, मुझे बचपन से पता है कि चिपक कर कैसे सोया जाता है। चिपक कर सोना शरीर के लिए भी लाभदायक है। इसमें आध्यात्म और फन का मिश्रण भी हैं। जैकी सोचती है कि उनके यहां आने वाले लोगों के जीवन में कई परेशानियां हैं। उनके कुछ पुराने ग्राहक ऐसे हैं, जिनकी पत्नियों की मौत हो चुकी है। कुछ ऐसे हैं, जो पहली बार लड़की के साथ सोना चाहते हैं। कुछ अपनी घरेलू समस्याओं से ग्रस्त है। जैकी अपनी सर्विस की आॅनलाइन प्रचार भी करती हैं।
इस धंधे में जैकी ने अंर्तवस्त्रों से ढके शरीर के किसी भी हिस्से को छूने पर पाबंदी रखती है। सोते समय वह पाजमा पहनती हैं। किसी तरह की अश्लील हरकत वह बर्दाश्त नहीं करती है। फिलहाल उसका यह बिजनेस इतना अच्छा चल रहा है कि उन्होंने एक और लड़कीको अपना सहयोगी बना कर रख लिया है। कई बार ऐसा भी होता है कि ग्राहक दो औरतों के साथ सोना चाहता है। कई बार ऐसा भी होता है कि जैकी को अश्लील फोन और ई-मेल आते हैं। जैकी बेबाकी से कहही है कि वेश्यावृति का उसके धंधे से ज्यादा आसान है, क्योंकि चिपक कर सोने में खुद को ज्यादा केंद्रित करना होता है।
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जहां आग में नहीं जलती मुर्दों की टांग!
सूरजबानी। गुजरात के कच्छ के रन में बनने वाला नमक देश की करीब 75 फीसदी नमक की जरूरत को पूरा करता है, लेकिन बहुत कम लोगों को इस कारोबार में लगे अगड़िया समुदाय के नमक मजदूरों की त्रासदी का भान है। ये मजदूर जिंदगी भर नमक बनाते हैं और अंत में मौत के बाद इन्हें नमक में ही दफन कर दिया जाता है। नमक मजदूरों के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि नमक में लगातार काम करने के कारण इनकी टांगे असामान्य रूप से पतली हो जाती हैं और इस कदर सख्त हो जाती हैं कि मौत के बाद चिता की आग भी उन्हें जला नहीं पाती। नमक के खेतों में काम करने वाले मजदूर बताते हैं कि इसलिए चिता की आग बुझने के बाद इनके परिजन इनकी टांगों को इकट्ठा करते हैं और अलग से नमक की बनाई गई कब्र में दफन करते हैं ताकि वे अपने आप गल जाएं। अहमदाबाद से 235 किलोमीटर और कच्छ जिला मुख्यालय से 150 किलोमीटर दूर स्थित सूरजबारी अरब सागर से मात्र दस किलोमीटर की दूरी पर है। गुजरात के पर्यटन अधिकारी मोहम्मद फारूक पठान ने बताया कि समुदाय के लोग यहां सदियों से रह रहे हैं और जीविका के रूप में उन्हें केवल यही काम आता है, नमक बनाना। यहां का भूजल समुद्री जल के मुकाबले दस गुना अधिक नमकीन है। इस भूजल को नलकूपों से निकाला जाता है और उसके बाद उस पानी को 25 गुना 25 मीटर के छोटे छोटे खेतों में भर दिया जाता है।’ उन्होंने बताया, ‘जब सूरज की किरणें इस पानी पर पड़ती हैं तो यह धीरे धीरे सफेद नमक में बदल जाता है ।’
गैर जाति के छूते ही झोपड़ी होती है अछूत
गैर जाति के छूते ही झोपड़ी होती है अछूत
अशोक दीक्षित
छत्तीसगढ़ के वनांचल में रहने वाले कमार भुंजिया जनजातियों की एक अनूठी परंपरा आज भी कायम है। इसमें वे अपने आवास के भीतर घास-फूंस से एक विशेष प्रकार की झोपड़ी बनाते है। इस झोपड़ी को वे लाल बंगला कहते हैं। इस बंगले को यदि कोई दूसरी जाति का व्यक्ति छू दे तो बंगले को वे आग के हवाले कर देते है, और नया लाल बंगला बनाते तक अन्न जल ग्रहण नहीं करते यह लाल बंगला उनकी इष्ट देवी और देवता का निवास होता है। जिसे कोई अन्य व्यक्ति नहीं छूने देते। क्षेत्र में कमारों के विकास के लिए कई योजनाएं चल रही है। इसके बावजूद कमार भुंजिया के भुंजिया के लोग विकास के लिए कई योजनाएं चल रही है इसके बावजूद कमार भुंजिया के लोग विकास की मुख्यधारा से नहीं जुड़े है। वे आज भी अपनी प्राचीन पंरपरा और मान्यताओं के साथ पिछड़ेपन की जिंदगी जीने को मजबूर है। गरियांबंद जिले के कटेपारा के तीजू भुंजिया (58) पिता फुलसिंग भुंजिया ने बताया कि वे लोग अपने आवास के भीतर एक अलग से छिंद, खद्दर, बांस और मिट्टी का छोटा घर बनाते है। कमारों की परंपरा को विस्तार से बताने वाले तीजू ने बताया कि लाल बंगला को जलाने के बाद छूने वाले व्यक्ति द्वारा लाल बंगला का निर्माण कराया जाता है। यदि वह तैयार नहीं होता तो वे स्वयं इसे तैयार करते हैं। जब तक बंगला दोबारा नहीं बन जाता तब तक उनके परिवार का खाना पीना बंद रहता है। वे लोग लाल बंगला में देवी देवताओं को बिठाते है। देवी और देवताओं का पूजा करते हैं। छूरा ब्लाक के कमार भुंजिया जनजातियों के लिए शासन द्वारा 25 हजार रुपए प्रति एकड़ की दर पर जमीन देने का प्रावधान है, लेकिन कमार भुंजिया लोगों को कृषि योग्य जमीन पर्दान नहीं की जा रही है। ब्लाक में इन जातियों के लिए किए जा रहे विकास के सारे दावे खोखले नजर आते हैं।
बेटियों की शादी के बाद लाल बंगले में प्रवेश निशेष : पूर्वजों की परंपरा के अनुसार कमारों की बेटियों को शादी के बाद लाल बंगले में प्रवेश निषेध है। शादी के बाद जब वह मायके आती है तब उसका विशेष ख्याल रखती है। किसी कमार भुंजिया की शादी ब्याह पर बेटी लाल बंगला में नहीं जाती वे इस परंपरा का निर्वाह जीवनभर करेंगे। साथ ही उनके आने वाली पीढ़ी भी इस परंपरा को निभाएगी। परिवार में किसी भी महिला के माहवारी आने पर बंगले को छु नहीं सकता। उस लाल बंगले के सामने अलग से अना हुआ मकान में गुजारा करते है। भुंजिया परिवार के लोग अपने निजी उपयोग में पीने अथवा उपयोग किए जाने पानी को नहर या नदियों या फिर कछार में छरिया बनाकर पानी निकालकर पानी उपयोग में लाते है।
जंगल से गांव की ओर : कमार भुंजिया जनजाति के लोग अपने आने वाली पीढ़ी को लेकर चिंतित हैं। वे जंगल से गांवों में जाकर बसते जा रहे हैं। वे अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर विकास की मुख्य धारा से जोड़ना चाहते हैं। हाट बजारों में किसी भी होटल या सार्वजनिक स्थानों में तेल से तली हुई वस्तुएं को सेवन नहीं करते है। स्वयं के द्वारा बनाएं ज्यादातर प्राय: बिना तेल के पसंद करते है। जंगली फलों को उपयोग में लाते हैं।
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अशोक दीक्षित
छत्तीसगढ़ के वनांचल में रहने वाले कमार भुंजिया जनजातियों की एक अनूठी परंपरा आज भी कायम है। इसमें वे अपने आवास के भीतर घास-फूंस से एक विशेष प्रकार की झोपड़ी बनाते है। इस झोपड़ी को वे लाल बंगला कहते हैं। इस बंगले को यदि कोई दूसरी जाति का व्यक्ति छू दे तो बंगले को वे आग के हवाले कर देते है, और नया लाल बंगला बनाते तक अन्न जल ग्रहण नहीं करते यह लाल बंगला उनकी इष्ट देवी और देवता का निवास होता है। जिसे कोई अन्य व्यक्ति नहीं छूने देते। क्षेत्र में कमारों के विकास के लिए कई योजनाएं चल रही है। इसके बावजूद कमार भुंजिया के भुंजिया के लोग विकास के लिए कई योजनाएं चल रही है इसके बावजूद कमार भुंजिया के लोग विकास की मुख्यधारा से नहीं जुड़े है। वे आज भी अपनी प्राचीन पंरपरा और मान्यताओं के साथ पिछड़ेपन की जिंदगी जीने को मजबूर है। गरियांबंद जिले के कटेपारा के तीजू भुंजिया (58) पिता फुलसिंग भुंजिया ने बताया कि वे लोग अपने आवास के भीतर एक अलग से छिंद, खद्दर, बांस और मिट्टी का छोटा घर बनाते है। कमारों की परंपरा को विस्तार से बताने वाले तीजू ने बताया कि लाल बंगला को जलाने के बाद छूने वाले व्यक्ति द्वारा लाल बंगला का निर्माण कराया जाता है। यदि वह तैयार नहीं होता तो वे स्वयं इसे तैयार करते हैं। जब तक बंगला दोबारा नहीं बन जाता तब तक उनके परिवार का खाना पीना बंद रहता है। वे लोग लाल बंगला में देवी देवताओं को बिठाते है। देवी और देवताओं का पूजा करते हैं। छूरा ब्लाक के कमार भुंजिया जनजातियों के लिए शासन द्वारा 25 हजार रुपए प्रति एकड़ की दर पर जमीन देने का प्रावधान है, लेकिन कमार भुंजिया लोगों को कृषि योग्य जमीन पर्दान नहीं की जा रही है। ब्लाक में इन जातियों के लिए किए जा रहे विकास के सारे दावे खोखले नजर आते हैं।
बेटियों की शादी के बाद लाल बंगले में प्रवेश निशेष : पूर्वजों की परंपरा के अनुसार कमारों की बेटियों को शादी के बाद लाल बंगले में प्रवेश निषेध है। शादी के बाद जब वह मायके आती है तब उसका विशेष ख्याल रखती है। किसी कमार भुंजिया की शादी ब्याह पर बेटी लाल बंगला में नहीं जाती वे इस परंपरा का निर्वाह जीवनभर करेंगे। साथ ही उनके आने वाली पीढ़ी भी इस परंपरा को निभाएगी। परिवार में किसी भी महिला के माहवारी आने पर बंगले को छु नहीं सकता। उस लाल बंगले के सामने अलग से अना हुआ मकान में गुजारा करते है। भुंजिया परिवार के लोग अपने निजी उपयोग में पीने अथवा उपयोग किए जाने पानी को नहर या नदियों या फिर कछार में छरिया बनाकर पानी निकालकर पानी उपयोग में लाते है।
जंगल से गांव की ओर : कमार भुंजिया जनजाति के लोग अपने आने वाली पीढ़ी को लेकर चिंतित हैं। वे जंगल से गांवों में जाकर बसते जा रहे हैं। वे अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर विकास की मुख्य धारा से जोड़ना चाहते हैं। हाट बजारों में किसी भी होटल या सार्वजनिक स्थानों में तेल से तली हुई वस्तुएं को सेवन नहीं करते है। स्वयं के द्वारा बनाएं ज्यादातर प्राय: बिना तेल के पसंद करते है। जंगली फलों को उपयोग में लाते हैं।
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10 रुपए के स्टांप पेपर पर बेटी का सौदा
जुर्माना भरना था तो 11 साल की बेटी बेच दी
नारायण बारेठ/जयपुर bbc
अभी वो सावन के झूलों, मंदिर की घंटियों और सहेलियों के संग खेलने-कूदने की उमंग से सराबोर थी। लेकिन उसे मां ने ही पराये हाथों बेच दिया। मां और खरीदार में बेटी के लिए ऐसे सौदा हुआ जैसे कोई जमीन-जायदाद या गांव में मवेशी के लिए खरीद-फ़ररोख्त हो रही हो। बोली लगी और मां ने अपनी 11 साल की बेटी को बेच दिया। राजस्थान के टोंक में पुलिस ने मां, खरीदार और बिचौलिये को गिरफ्तार कर लिया है। सौदा दस रुपये के स्टाम्प कागज पर हुआ और भुगतान किस्तों में तय हुआ था। पुलिस के मुताबिक इसका भांडा तब फूटा जब बालिका ने इस सौदे का विरोध किया और बचने के लिए बस्ती से निकल भागी। बालिका का पीछा किया गया तो वो बचने के लिए एक होटल में घुस गई और फर्नीचर के पीछे छुप गई। इसे देख लोगों ने पुलिस को इत्तिला दी और इस खरीद-फरोख्त सामने आ गई।
पुलिस के मुताबिक, बालिका की मां झालावाड़ की रहने वाली है। बालिका के खरीदार के साथ मां को गिरफ्तार कर लिया गया है। टोंक के पुलिस मानव तस्करी विरोधी यूनिट के उप निरीक्षक राकेश वर्मा ने कहा कि न लोगों को अदालत में पेश किया गया है। अब ये 8 फरवरी तक पुलिस रिमांड पर हैं। हम घटना की तह में जाने की कोशिश कर रहे है। वहीं लड़की की मां ने पुलिस को बताया कि पंचायत ने उस पर साढ़े चार लाख रुपये का जुर्माना लगाया था जिसके बाद उसने बेटी की बिक्री की क्योंकि उसे जुर्माने के लिए पैसे की जरूरत थी। महिला ने पुलिस को बताया कि उसने अपनी बेटी को सवाई माधोपुर में एक व्यक्ति के यहां 'नाते' बैठा दिया था। नाता राजस्थान में शादी की एक प्रथा है इसमें पुरुष महिला के बदले कुछ पैसा देकर शादी कर लेता है। मां अपनी बेटी को कुछ समय बाद ही सवाई माधोपुर से वापस घर ले आई। पंचायत ने इसे गलत माना और अर्थ दंड लगा दिया। इस हिसाब से लड़की दूसरी बार बिकी है। बेटी के लिए ऐसे सौदा हुआ मानो मवेशी के लिए खरीद-फ़रोख्त हो रही हो।
पुलिस को मिले दस्तावेज के मुताबिक सौदा साढ़े छह लाख में तय हुआ जिसकी पहली किश्त दो लाख रुपए 16 दिसंबर को दी गई। पुलिस को बालिका ने बताया कि मां का कलेजा नहीं पसीजा और उसे ख़रीदार को सौंप दिया गया। वे उसे कंजरी बस्ती ले आये और अनैतिक कार्य के लिए दबाव डालने लगे। उसके साथ मारपीट भी की गई। बालिका ने पुलिस को बताया कि उसे मुंबई में बेचने के बात की जा रही थी तभी वो भाग निकली। पुलिस के अनुसार बालिका सवारी ढोने वाली एक जीप में बैठ गई और किराया मांगा तो रोने लगी। तभी दोनों ख़रीदार उसे पकड़ने के लिए आ गए. उनसे बचने के लिए वो सड़क किनारे एक होटल में दाखिल हो गई। फिलहाल लड़की को बालिका-गृह में रखा गया है।
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सरकार ने हाईजैक कर ली नुक्कड़ की क्रांति
रू-ब-रू :डा. संजय जिवने
प्रसिद्ध नुक्कड नाट्य रंगकर्मी संजय जिवने से संजय स्वदेश की बातचीत
कर्ज में डूबे किसानों के कारण देश-दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचने वाले महाराष्टÑ के विदर्भ क्षेत्र में रंगमंच की समृद्ध परंपरा रही है। कभी विदर्भ में करीब दो दर्जन से ज्यादा रंगमंच की संस्थाएं सक्रिय रहीं। लेकिन जैसे-जैसे समाज बदला। रंगमंच के रंग काफूर होते चले गए। कुछ कलाकार समाज की बदलती नब्ज को भांप कर मुंबई जा कर चकाचौंध की दुनिया में खो गए। अब कागजों में दो चार संस्थाएं सक्रिय हैं। कभी मौके-बे-मौके साल में दो चार नाटकों के मंचन भी दिख जाता है। ऐसे मौके पर आने वाले पुराने दर्शक नष्ट हो चुके समृद्ध रंगमंच की परंपरा को याद कर लेते हैं। इसी समृद्ध परंपरा में एक नाम संजय जिवने का हैं। बीते चार दशक से संजय जीवने नुक्कड पर नाटकों से क्रांति की अलख जगा रहे हैं। श्री जिवने समाज के दबे-कुचले शोषित और वंचित वर्ग समस्याओं की विषयवस्तु के साथ ही अभिनय का ऐसा ताना बना बुनते हैं कि नुक्कड़ के दर्शकों के दिल में अमिट छाप छोड़ देते हैं। उनके अदंर की संवदेनाओं में हिलोरे आने लगती हैं। नाटक से उभरने वाली संवदेना दर्शकों के मन में सार्थक जीवन के लिए कितनी झकझोरती है, इसकी चिंता उन्हें नहीं है। श्री जिवने कहते हैं कि कुछ दर्शक नाटक के विषय वस्तु से दिल में उभरी टीस को नुक्कड़ पर ही छोड़ आगे बढ़Þ जाते हैं तो कुछ समाज में सार्थक करने का संकल्प ले लेते हैं। पर इससे समाज में बदलावा की गति बहुत मंद तो हैं, लेकिन प्रभावी है। यह सब चलते रहता है। बदली जीवन शैली में वे समाज को जगाने का संकल्प लेकर अपना दायित्व बखूबी निभाने में लगे हैं। गत दिनों नागपुर में उनसे नुक्कड़ नाटकों पर लंबी चर्चा हुई। प्रस्तुत है डा. संजय जिवने से हुई बातचीत के कुछ प्रमुख अंश :-
प्रश्न -वर्तमान समय में देश में नुक्कड़ नाटकों की क्या स्थिति है
उत्तर -आज नुक्कड़ नाटक हैं कहां, जो हैं, उसे सरकार ने हाईजैक कर रखा है। जो लोग इससे जुड़े हैं, उसमें से अधिकतर सरकार के लिए ही काम कर रहे हैं। वे अधिकांश समय इसी गुणा-गणित में व्यस्त रहते हैं कि किस विषय वस्तु पर नुक्कड़ नाटक की परियोजना बने और सरकार उसे मंचन के लिए प्रायोजित करें। धन मिले। कई बार सरकारी परियोजनाओं पर नजर रख कर उसके अनुरूप विषय वस्तु तैयार कर अनुदान खाने के लिए काम किया जाता है। यही कारण है कि आज कही किसी नुक्कड़ पर कोई नाटक दिखता है तो उसका विषय वस्तु इतना सहज होता है, तो दर्शक उसे मनोरंजन की तरह लेते हैं। यदि कोई स्वतंत्र रूप से समाज को जगाने के लिए ऐसा कुछ कर रहा है तो उस पर सरकार की बंदिशे हैं। महाराष्टÑ में तो यह स्थिति है कि यदि नुक्कड़ पर नाटक का मंचन करना है तो सेंसर बोर्ड से आपको अनुमति लेनी पड़ेगी। फिर जब वहां आवेदन जाता है तो स्क्रीप्ट में तरह-तरह की खामियां निकाली जाती हैं। उसे निकालने को कहा जाता है। इससे कई बार अंर्तवस्तु कमजोर पड़ जाती है। नाटक उद्देश्य से भटक जाता है। यह सरकार की नकेल है।
प्रश्न- तो क्या आज नुक्कड नाटक अपने उद्देश्य से भटक गया है?
उत्तर- जाहिर सी बात है, जब सरकार किसी नाटक को प्रायोजित करेगी तो उसका विषय वस्तु भी सरकार का ही होगा। इसलिए ऐसे नुक्कड़ नाटकों का ठेका लेने वाले उसी विषय वस्तु को तय करते हैं जिससे केवल सरकार का उद्देश्य भर पूरा हो सके। लेकिन ऐसे नाटकों में विषय समग्रता के साथ साकार नहीं हो पाते हैं। उसकी प्रस्तुति गंभीर नहीं हो पाती। हल्के से चुटिले अंदाज में प्रस्तुति भर से इतिश्री हो जाती है। दरअसल नुक्कड़ नाटक एक क्रांति हैं, थोड़े समय में चुनौतिपूर्ण अभिनय के माध्यम से जनता को जगाना महान उद्देश्य है, इसे कमाई का साधन बनाने से इसका उद्देश्य खत्म हो जाता है। जब उद्देश्य महान हो तो उसकी कार्यशौली भी पाक साफ होनी चाहिए। प्रायोजित नाटकों से महान उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकती है।
प्रश्न-कई कलाकार कहते हैं कि यदि समुचित सुविधा उपलब्ध कराई जाए तो मृत होती इस कला में नई जान आ सकती है?
उत्तर- नुक्कड़ नाटकों के लिए किस तरह की साधन और सुविधा की जरूरत है? क्या इसके मंचन के लिए संगीत और रोशनी के तकनीकी साधनों से लैस प्रेक्षागृह की आवश्यकता है या अभ्यास के लिए किसी जगह की? यह सब बहाने हैं। जगह और साधन की बात छोड़िए। यदि अंदर आग है तो स्पेश अपने आप मिल जाता है। समाज बदल चुका है। लोगों की सोच बदल चुकी है। यह समाज स्वयं आगे आकर कोई स्पेश और साधन नहीं देगा। यदि साधन मिल भी जाए तो इस बात की क्या गारंटी है कि नुक्कड़ नाटकों में धार आ जाएगी।
प्रश्न- बिना अनुदान या अन्य किसी तरह के सहयोग या साधन के आभाव में आज नुक्कड़ नाटकों की सफलता कैसे संभव है?
उत्तर- आप सार्थक उद्देश्य से नाटक का मंचन करना चाहते हैं तो आपको न फंड की जरूरत है और न ही किसी साधन की। इसका जीता जागता उदाहरण मैं स्वयं हूं। 1978 से भूखे प्यासे नुक्कड़ पर समाज को जगाने का अभियान जारी है। ऐसा यह संभव इसलिए क्योंकि इसे मैंने सोए हुए समाज को जगाने के लिए अपनी जिम्मेदारी समझा। लेकिन सबसे ऐसा जज्बा नहीं होता है। जैसे जैसे लोगों के जीने का तरीका बदला, आदर्श बदले इसका असर इस कला पर भी पड़ा। इससे जुड़े अनेक कलाकारों ने मूल्यों से समझौता किया। लेकिन जिन्होंने परिस्थितियों से हार कर मूल्यों से समझौता किया, वे समाज को नहीं जगा पाए।
प्रश्न- आजकल नुक्कड़ नाटकों के लिए स्क्रीप्ट कौन लिखता है? इसकी क्या स्थिति है?
उत्तर- स्क्रीप्ट की क्राइसिस पहले भी थी और अब भी है। यह सब चलते रहता है। मुख्यधारा के रंगमंच में भी यही हाल है। इसी क्राइसिस के बीच-बीच में बेहतरीन स्क्रीप्ट आते रहते हैं। जिन कलाकारों के पास अपना विजन (दृष्टिकोण) हैं, अधिकर स्क्रीप्ट वे स्वयं ही तैयार कर लेते हैं।
प्रश्न -आपके अधिक३ंर नाटक दलित समस्याओं के इर्द-गिर्द घुमती है? क्या आपने सुनियोजित तरीके से रंगमंच के इस विधा को दलित श्रेणी में बांटा?
उत्तर- देश में जब कम्युनिस्ट आए, तब उन्होंने बड़े ही जोर-शोर से शोषितों के दर्द को मुद्दा बनाया। लेकिन वे यह नहीं समझ सकें कि भारत की असली समस्या क्या है? मूल्यों पर खूब थिएटर हुए। वे कहने के लिए प्रोगे्रसिव रहे हैं, पर वास्तविक विषय से दूर रहे। यहां अंतिम आदमी का कोई सरोकार नहीं था। हमारी बात ही नहीं, सवाल नहीं, विषय नहीं, संघर्ष नहीं। तभी मन में यह दृढ़ता आई कि हम लोग दलित नुक्कड़ नाटकों को अलग से खड़ा करें। हमने समाज के समस्या को स्वयं भोगा था। दर्द को महसूस किया था। इसलिए लगा कि इस समाज के विषयों को लेकर उनके बीच ही जाना चाहिए और उनके मन का भ्रम तोड़ना चाहिए, जिससे कि वे सार्थन जीवन जी सकें। इसलिए हम लोगों ने अपने समाज के विषयों को अपने मंचन का विषय चुना। जब दलित मुद्दे को उठाया तो लोग हंसते थे। लेकिन आज सीरियस हैं। आज पीठ पीछे भले ही कुछ भी कहते हों, लेकिन सामने नहंी हंस सकते हैं। उन्हें मालूम है कि जाति समाज में अस्तित्व में है। यह देश की हकीकत है। इन विषयों से विमुख होकर समस्या का समाधान केसे किया जा सकता है। यही कारण है कि दलित नुक्कड नाटकों को अलग करना पड़ा।
प्रश्न-नुक्कड़ नाटकों से जुड़ने की आपकी प्रेरणा कहां से और कैसे मिली?
उत्तर- 1978 में महाराष्टÑ के मराठा विश्वविद्यालय का नाम बदल कर बाबा साहब के नाम पर करने का संघर्ष चला। इसके लिए हजारों लोग सड़ पर उतर गए। दलित तबके ने संघर्ष किया। गोली खाई। शहीद हुए। बलिदान दिए। अनेक युवाओं की शिक्षा गई। नौकरी छूटी। उसी वक्त लगा कि दलित समाज को जगाने के लिए नुक्कड़ नाटक को माध्यम बनाने का यह सही वक्त है। यही प्रभावकारी शास्त्र है। तब से जो सिलसिला शुरू हुआ वह आज भी जारी है।
प्रश्न- नुक्कड़ नाटकों का आज समाज पर क्या असर है? इस कला से पूर्णकालीन जुड़ने के कारण आपके निजी जीवन पर क्या असर पड़ा?
उत्तर-नुक्कड़ नाटकों का प्रभाव बहुत धीमी गति से पड़ता है। पर यह प्रभावी ढंग से काम करता है। शोषित वर्गों के लिए यह काम आ सकता है। पूरे परिवार के साथ इसमें जुड़े हुए हैं। बिना बलिदान दिए कुछ नहीं मिल सकता है।
प्रश्न-अब तक कितने नुक्कड़ नाटक लिखे। कितने मंचन किए। दूसरे क्षेत्रों में मंचन में भाषा की कितनी समस्या हुई?
उत्तर-देश के हर राज्यों के अलावा विदेशों में भी हजारों नाटक का मंचन किया। करीब 100 से ज्यादा नाटक लिखा। देश और देश के बाहर तक मंचन किया। एशिया के अलावा यूरोपिय देशों में भी मंचन का मौका मिला। लेकिन हमेंभाषा को लेकर कभी कोई समस्या नहीं आई। क्योंकि हमारा विषय है पीड़ित, वंचित और शोषित वर्ग। इस वर्ग के लिए भाषा कभी बाधा नहीं हो सकता है। क्योंकि शोषण और भूख की कोई भाषा नहीं होती है।
प्रश्न-आज दलित समाज को जगाने के लिए नुक्कड़ पर क्रांति की अलख जगा रहे हैं, तो इस समाज के समाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत लोगों से कितनी अपेक्षा होती है और कितना सहयोग मिलता है?
उत्तर-समाज के जिन लोगों ने मूवमेंट देखा है। स्वयं इसमें हिस्सा लिया और और उसके बाद समाज और शासन में कोई पद या प्रतिष्ठा प्राप्त की है, वे तो सतर्क हैं। लेकिन क्रांति के लिए सड़क पर लड़ने वाले आम आदमी आदमी होता है। मीडिया और हमारे समाज के ही अपर क्लास से बस इतनी ही अपेक्षा है कि वे हमे कुछ दे नहीं सकते तो बस सपोर्ट भर करें और जिन्हें चमड़ी बचनी है उससे उम्मीद भी नहीं है। ऐसे लोगों से आंदोलन अड़ता भी नहीं है।
प्रश्न-जो लोग दलित नुक्कड़ नाटकों से जुड़े हैं, उसके लिए क्या कहना चाहेंगे?
उत्तर- ग्लोबलाजेशन, निजीकरण के परिणाम सार्थक उद्देश्य को निगल रहे हैं। जो इससे जुड़ें हैं, वे थोड़ा और गंभीर हो जाए। जिनके अंदर थोड़ी सी भी बचैनी हैं, उन्हें आंखों में तेल डाल कर जिम्मेदारी लेनी चाहिए। आज बदलते दौर में आदमी अनेक ऐसी समस्याओं से घीर चुका है कि वह आत्महत्या जैसे कदम उठा रहा है। उसे सही जगह पर लाना पड़ेगा।
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